Sunday, May 21, 2023

वरिष्ठ नागरिक सेवा संरक्षण

वरिष्ठ नागरिक सेवा संरक्षण एवम नई पीढ़ी हेतु अनुभव शिक्षा मिशन 

वर्तमान सूचना प्रौद्योगिकी तकनीकी संपन्नता के इस दौर में भौतिकवाद की उपभोक्तावादी भोगवादी मानसिकता बढ़ती ही चली जा रही है । परिणाम स्वरूप समाज में आपाधापी, लोलूप स्वार्थी संकीर्णता फैल गई है । सामाजिक तानाबाना बिखर गया है परिवार व्यवस्था  छिन्न भिन्न हो गई है आपसी प्रेम और विश्वास कम होता जा रहा है। 

परस्पर रिश्तों में तनाव विवाद और टूटन अलगाव बढ़ता ही चला रहा है। ऐसे में परिवार के वरिष्ठ बड़े बुजुर्ग सदस्यों की जिंदगी संकट ग्रस्त हो गई है उन्हें नियमित समुचित स्वास्थ्य सुविधा और औषधि, पौष्टिक आहार भी नही मिल पा रहा है इस तरह वरिष्ठ नागरिक समाज परिवारों में विषम प्रतिकूल दशा उपेक्षित व्यवहार व दयनीय स्थिति में अपना जीवन यापन करने पर मजबूर हैं। 

जबकि नई पीढ़ी को भावी जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शिक्षा दीक्षा नोनिहालों को संस्कारवान बनाने में परिवार को सुरक्षित संरक्षित रखने में युवाओं को अपने जीवन के अनुभवों से सिखाने प्रेरणा देने की महत्त्वपूर्ण भूमिका सदैव से घर परिवार और समाज में बड़े बुजुर्ग वरिष्ठ सदस्यों की रही है। 

निसंदेह वरिष्ठ नागरिकों की समाज में काफी महत्वपूर्ण उपयोगिता हैं। वरिष्ठ नागरिक समाज की अमूल्य अमानत हैं। हमेशा से ही समाज के विकास में भी वरिष्ठ नागरिकों का काफी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 

 वरिष्ठ नागरिकों को जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में किए गए कार्यों का व्यापक स्तर पर अनुभव होता है। इसलिए युवा वर्ग को हमेशा इनके करीब रहकर इनसे ज्ञान और संस्कार प्राप्त करनी चाहिए।

समाज परिवारों में वरिष्ठ नागरिक बड़े बुजुर्ग सदस्यों की तनाव ग्रस्त दशा उपेक्षित व्यवहार की बढ़ती घटनाएं गंभीर व चिंताजनक विषय है।

वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानजनक जीने की व्यवस्था समुचित स्वास्थ्य देखरेख औषधि, आहार पोषण आवास संरक्षण मिले । इस हेतु व्यापक स्तर पर सुधारात्मक गतिविधियां संचालित की जाने की आवश्यकता है। 

वरिष्ठ नागरिक सेवा संरक्षण एवम नई पीढ़ी हेतु अनुभव शिक्षा मिशन  उसी दिशा में अपनी सार्थक भूमिका निभाने के वरिष्ठ नागरिक सेवा संकल्प पालन हेतु कार्यरत हो युवा पीढ़ी वरिष्ठ नागरिक परस्पर पूरक सेवा सम्पर्क संवाद विगत कई वर्षों से अपनी सेवा प्रदान कर रहा है।

वरिष्ठ नागरिक  स्वास्थ्य पौष्टिक आहार औषधि सेवा आध्यात्मिक योग ध्यान कार्यक्रम आयोजन हेतु संपर्क करें।

आइए आप भी इस भारतीय संस्कृति के पुनीत "वानप्रस्थ आश्रम" वरिष्ठ बुजुर्ग सेवा  के कर्तव्य पालन  से जुड़े एवम अपने वरिष्ठ नागरिक सम्मान सेवा संरक्षण मिशन को मजबूती प्रदान करें।

डा सुरेंद्र सिंह विरहे

Divine Life Solutions

उत्कर्ष.. संस्थान

नोदैहिक आरोग्य विशेषज्ञ वम आध्यात्मिक मानसिक स्वास्थ्य योग चिकित्सक 

उप निदेशक

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी संस्कृति परिषद्

शोध समन्वयक

आध्यात्मिक नैतिक मूल्य शिक्षा शोध

धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग मध्य प्रदेश शासन भोपाल मध्यप्रदेश

9826042177

8989832149


Saturday, April 1, 2023

*कोरोना कोविड संक्रमण एक बार फिर से फैल सकता है ... सावधान सतर्क होने की आवश्यकता है।*

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*कोरोना कोविड संक्रमण एक बार फिर से फैल सकता है ... सावधान सतर्क होने की आवश्यकता है।*


अपने जीवन में सर्वोच्च प्राथमिकता अपने एवं परिवार के लिए स्वास्थय आरोग्य पाना होना चाहिए।


आज के बिगड़ते पर्यावरण और मानसिक रोग ग्रस्तता विकट गंभीर रूग्णता के वातावरण में लोगों की स्वास्थ्य सुरक्षा व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है। किसी भी तरह की स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही घातक हो सकती है। स्वास्थ्य स्वच्छता के प्रति असावधानी संक्रमण को न्यौता देने के समान है। स्वस्थ जीवन का संकल्प लें।


 अपनी जीवन शैली, खानपान, दिन चर्या सुधारें। पर्याप्त निंद्रा आवश्यकता को पूरा करें। व्यसन, प्रतिदिन नशाखोरी मादक पदार्थों के सेवन की बुरी लत को शीघ्र अतिशीघ्र त्याग दें। 


इन स्वास्थ्य की दुश्मन मादक पदार्थों के सेवन की आदतों, कुप्रव्रतियों को जड़ से खत्म करें।अपने जीवन में योग, ध्यान ,प्राकृतिक ऑर्गेनिक आहार अपनाए। 


सद आचरण और संयम व्रत का अनुपालन करें। झूठ, फरेब, धोखा लालच,घमंड, इर्षा, बैर आदि को अपने व्यवहार में न आने दें क्योंकि इन सब अवगुणों से दूराचार,पाखंड कुकर्मों से आत्म ग्लानि आत्म क्लेश बढ़ता है जिससे मानसिक तनाव, अवसाद ,निराशा, नकरात्मकता बढ़ती है और फिर हम मानसिक रूप से बीमार हो जाते हैं। 


इन सब से बचने के लिए सात्विक विचार भाव आचरण हमें अपनाना होगा। मानवीय मूल्यों और संवेदनशीलता को दैनिक जीवन में सर्वोच्च महत्व देकर अनुशासित जीवन जीना होगा। अन्यथा हमारा व आने वाली नई युवा पीढ़ी का भविष्य अंधकारमय और आत्मघाती हो जाएगा।


 नैतिक मूल्यों आदर्शो को अपनाने के लिए नई पीढ़ी को सनातन धर्म संस्कृति के अनुरूप शिक्षा संस्कार देने होंगे। युवाओं को उद्यमिता के साथ साथ आध्यात्मिकता से भी जोड़ना होगा।


साधन और साध्य की सुचिता, कथनी और करनी की प्रामाणिकता, पारस्परिक प्रेम, सदभाव,सहयोग, सहानुभूति द्वारा सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा समझ जगाना होगी।


व्यक्तिगत जीवन सादगीपूर्ण और सार्वजनिक जीवन कर्त्तव्य पालन, सुनागरिकता दायित्व निर्वहन के साथ जीना होगा।


मनोदैहिक आरोग्य और आध्यात्मिक स्वास्थ्ययुक्त जीवन हेतु संपर्क करें

डा सुरेंद्र सिंह विरहे

9826042177

जीवन आज है अभी है इसी पल में आनंद असली मौज है

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जीवन आज है अभी है इसी पल में आनंद असली मौज है

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 जीवन आज है अभी है इसी पल में आनंद असली मौज है। जो बीत गया सो बीत गया,अच्छा बुरा वक्त, अच्छे बुरे अनुभव, अच्छे बुरे लोगों से संबंध कभी न कभी छूट ही जाता है। इसलिए बीते कल की बातें को भूलकर अच्छी बुरी स्मृतियों, अच्छी बुरी घटनाओं, अच्छे बुरे बर्ताव दूसरों द्वारा किए गए मान अपमान आदि को नजरंदाज करके एक नई शुरुआत फिर से करें।

 आज में वर्तमान में जिंदादिली से पूरे उत्साह उमंग के साथ ज़िंदगी को हर पल आनंद खुशी और मुस्कुराहट के साथ जीना सीखें।खुद की परवाह,खुद की फिक्र सबसे पहले करना सीखें। दूसरा कभी भी आपका हमेशा साथ नहीं देने वाला है।हर एक रिश्ता प्रिय या अप्रिय एक न एक दिन छूट ही जाता है।

स्वयं को गहरे से जाने,स्वयं से आत्म संवाद करने की कला सीखें। खुदी को बुलंद करें। अपने मन मस्तिष्क में शान्ति स्थापित करें। बैचेन होने व्याकुल, व्यग्र होने से बचें। विचारों में सकारात्मकता लाएं।नकारात्मक बातों को छोड़कर,नकारात्मक सोच वालों से दूरी बना लें। स्वयं के स्वास्थ्य के प्रति सदैव सजग सचेत रहें। सुबह की सैर करने नियमित रूप जाएं, उगते सूरज को निहारें। पंछी चिड़िया के कलरव को सुनें। एकांत में, मौन में रहना सीखें। 

अपने आपको ध्यान की अनुभूतियों से जोड़कर सृजनात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करें। कला ,संगीत , नृत्य आदि से स्वयं को जोड़ें। स्वाध्याय पठन पाठन लेखन आदि में स्वयं को व्यस्त रखें। अपने जीवन को किसी महान लक्ष्य एवम आध्यात्मिक ध्येय अनुगामी बनाने में सदैव तत्पर व सक्रिय रहें।

अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों को जानें।अपनी मूल रुचि अभिरुचि में तल्लीन रहना सीखें।

मनोदैहिक आरोग्य एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य लाभ लेने अथवा अधिक परामर्श लेनें हेतु संपर्क करें :

डा.सुरेंद्र सिंह विरहे

मानसिक मनोदैहिक आध्यात्मिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ 

लाईफ कोच

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Saturday, March 25, 2023

सनातन धर्म हिंदू युगांतर गौरवशाली परंपरा की अद्वितीय महान पहचान है।

 सनातन धर्म शाश्वत सत्य और गौरवशाली अतीत का प्रतीक है।

सनातन धर्म हिंदू भारतीय संस्कृति दर्शन इतिहास की युग युगांतर गौरवशाली परंपरा की अद्वितीय महान पहचान है।

"मानव जाति का सनातन धर्म जो भारतवर्ष की युग-युगांतर जीवन शैली ही हुआ करती थी, उसका नामकरण सिंधु नदी पारकर आए आक्रमणकारियों और आगंतुकों नें सिंधु कर दिया और समय के साथ सिंधु - हिंदु (Indus - India) बन गया।


 इस प्रकार भारत को अरब प्रदेश में "हिंदुस्तान" के नाम से जाना गया और हमने सहर्ष ही इस नाम से सम्बोधित अपनी पहचान को अपना लिया। इस तरह सनातन धर्म (शाब्दिक अर्थ "शाश्वत धर्म") का नाम हिंदु धर्म पड़ गया जो सिंधु नदी से व्युत्पन्न है।


यह धर्म एक व्यक्ति,संत, पैगम्बर, या नबी द्वारा नही स्थापित किया गया, क्योंकि ज्ञान तो अनादि है, तथा "भगवान – सृष्टिनिर्माता - मूलसत्" को आत्मसात करने का सनातन "विज्ञान" वेदों में वर्णित है। वेदों के इस विज्ञान को कलियुग के हेतु गीता (कृष्ण-अर्जुन के बीच संवाद का प्रतिनिधित्व करने वाले 700 छंद की एक रचना) में पुनः सारगर्भित किया गया। 

 सनातन धर्म के अनुसार, देवी देवता भी सूक्ष्म और कारण देही प्राणी हैं, जो स्वकर्म द्वारा दैवीय स्थिति को प्राप्त कर ,स्थूल देह से मुक्त होकर परा प्रकृति में जीवन यापन करते हैं, परंतु वह भी अपूर्ण हैं और कैवल्यम् के लिये प्रयासरत् हैं।


सनातन धर्म में केवल एक ही परमेश्वर (परम निरपेक्ष चेतना) का गुणगान है। वह सच्चिदानंद ही परम स्रोत / ऊर्जा / ब्रह्मांड निर्माता है। ब्रह्मांडीय चेतना के तीन पहलू हैं - सर्वप्रथम सृजनात्मकता ब्रह्मा के रूप में दर्शाया गया है, तत्पश्चात् विलयात्मकता शिव के रूप में चित्रित किया गया और पोषणात्मकता विष्णु के रूप में चित्रित है। वह परम चैतन्यता पारब्रह्म या जगदीश (अस्तित्व के तीनों आयामों के ईश) है।

 

इन ज्ञानपूरित अवधारणाओं को साधारण मनुष्य के चित् पर अंकित करने हेतु, चित्रों और प्रतीकों का उपयोग किया गया। उदाहरण के लिए कुछ देवी देवताओं को सहस्त्रकमल पर विराजमान किया जाता है, इसका मतलब है कि उन जीवात्माओं ने जितेन्द्रीय चैतन्यस्थिति (सभी 10 इंद्रियाँ और उनमें से प्रत्येक के 100 उप-कार्यों पर विजय) प्राप्त कर ली। कुछ सूक्ष्म दिव्य प्राणियों को हम पितृरूप में मार्गदर्शक मानते हैं, इससे ऊँचे कुलदेवी-देवता, उसके उपरांत अन्य देवी और देव तथा उच्चतम हैं महादेव, यद्यपि महादेव कोई देवता नही हैं अपितु, स्वयं सच्चिदानंद हैं; परंतु हम शब्दजाल में फँस जाते हैं।

यह मानव शरीर प्रभुता से एकत्व हेतु एक उत्तम साधन से ज्यादा कुछ नहीं, समस्त विज्ञान की शाखाओं की परिणति "आध्यात्मिक विज्ञान" है। हिंदू धर्म की अनेकों कथाएँ देवताओं का उल्लेख करती हैं और देव असंख्य हैं; क्योंकि आज की मानवरूपी जीवात्मा - कल की भावी देवात्मा है और वह “कल” भविष्य में कितना दूर है, यह हमारे सत्कर्म निर्धारित करते हैं। जब मानव को प्रकृति के रहस्य, आध्यात्मिक विज्ञान के अभ्यास से ज्ञात होते हैं तो उसके कर्म, हम स्वयं की अनभिज्ञता के कारण, अलौकिक शक्तियों द्वारा सम्पन्न समझते हैं।


सभी देवी देवताओं को त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु और शिव / महेश) से निम्न परिलक्षित करते हैं। ये देवी देवता भी अपनी सूक्ष्म देह मात्र में कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं और परमेश्वर के साथ एक होने के लिए प्रयासरत हैं; तथा एकत्व प्रगमन हेतु विशिष्ट परिस्थितियों में कभी मानव शरीर धारण करने की भी जरूरत होती है। इस प्रकार, देवी देवता भी सृष्टिनियम की सीमाओं से बंधे हुए हैं, लेकिन सच्चिदानंद सृष्टि के जनक हैं और उससे परे हैं।


इस त्रिमूर्ति को कई अवधारणाओं को समझाने हेतु युग-युगांतर में प्रयुक्त किया गया है जिससे अल्पज्ञानियों को भ्रांति और दुविधा होती है, जैसे:


१. परम निरपेक्ष चेतना है:- सत् (विष्णु) - चित् (शिव) - आनंद(ब्रह्मा)  


२. प्रभुता का आरोहण:- ओम् (ब्रह्मा) - तत् (शिव) - सत् (विष्णु) 


३. त्रिमूर्ति ईश्वर:- परमेश्वर (विष्णु) - महेश्वर (शिव) - ब्रह्मेश्वर (ब्रह्मा) 


४. ईसा मसीह द्वारा प्रस्तुतीकरण:- गाॅड द फादर (विष्णु) - सन् आॅफ गाॅड (शिव) - होली गोस्ट (ब्रह्मा)

५. त्रिगुणी प्रकृति (दुर्गा):- सत् (विष्णु) - रजस (ब्रह्मा) - तमस (शिव) 


६. सृष्टिचक्र:- सृजन (ब्रह्मा) - पोषण (विष्णु) - विलय (शिव) 

७. परम निरपेक्ष चेतना की अभिव्यक्ति:- कर्ता (ब्रह्मा) - धर्ता (विष्णु) - हर्ता (शिव)


देवी देवता प्राणी हैं, जो सूक्ष्म और कारण संसार में आम तौर पर कार्य कर रहे हैं परंतु हम इस लेख में उस दिशा में नही जायेंगे। जितनी उच्चतर जीवात्मा, उतना ही उच्च देवता का विकास। दैवीय स्थितिनुसार एवं कर्मानुसार, देव भी अपने पदों को कुछ समय के बाद खो देते हैं, कुछ भी कैवल्यम् के पद पर आसीन होने से पूर्व प्रत्याभूतित नही है। हाँलाकि, उच्चतर आवृत्तियों से स्पंदनशील सूक्ष्म क्षेत्रों में काल का माप हमारे समय के माप से बहुत भिन्न है। काल की इकाई, परिवर्तन की माप मात्र है और सूक्ष्म जगत् अधिक स्थिर है, इस प्रकार, सूक्ष्म जगत के समय की इकाई - सांसारिक या, अस्तित्व के दृश्य जगत् की तुलना में काफी लंबी है।

सभी अनन्त वैयक्तिक आत्माओं का अंतिम गंतव्य अपने महासागर परमात्मा जनक के साथ एकत्व ही है और उसके बाद ही स्वयं की वास्तविकता का एहसास होता है; परम सच्चाई की अनुभूति। वैयक्तिक आत्माओं (पुरुष) और सृष्टि (प्रकृति) के मिलन से ही गतिविधि चक्र का चलन है और जब विलय (शिव का तांडव) पश्चात्, रचनात्मक चक्र एक निष्क्रिय अवस्था में आता है, तत्पश्चात् पुनः सृष्टि चक्र शुरू होता है और इस प्रकार चैतन्य गतिविधि निरंतर जारी है।


मौलिक तौर पर , अस्तित्व के सात आयाम, परम सत्य के परिचायक हैं। जितना उच्चतर जीवात्मा का विकास, उतना ही उच्च उसके अस्तित्व का आयाम, उतनी उच्च स्वतंत्रता एवं उच्च परिचालन शक्तियों और उच्च स्थिरता के लिए वह अग्रणी रहेगा।


शिरडी साईं बाबा की अलौकिक शक्तियां देखकर हमारे द्वारा उन्हे भगवान करार दिया गया है और इस तरह से सनातन धर्मानुसार देवी-देवता वास्तव में अनंत हैं क्योंकि प्रत्येक मानव, भगवान की एक दर्पण छवि (ईश्वर साक्षात्कार की क्षमता) है। मानवरूप में आने के उपरांत, जीवात्मा का विकास उसकी स्वतंत्र इच्छाशक्ति पर निर्भर है। उत्तरार्द्ध पथ का अनुगमन, अविद्या के कारण नही चुना जाता है।


परमात्मा बलपूर्वक अथवा इच्छा शक्ति के साथ हस्तक्षेप से नहीं, अपितु, व्यक्तिगत आत्माओं का उसके प्रति, प्रेम और भक्ति (तीव्र प्रेमादर ही भक्ति है) के द्वारा अपनाता है।


इस प्रकार देवता भी निस्संदेह अपने भक्तों का सीमित मार्गदर्शन सृष्टि नियम के अधीन करने के लिए बाध्य हैं। जैसे एक कमांडर अपने दल के लिए कुछ अच्छा कर सकते हैं, हालांकि, सेना के नियमों का पालन करना पड़ता है।


शिरडी साईं बाबा, गौतम बुद्ध, राम, कृष्ण, मोहम्मद, यीशु, गुरु नानक और बाकी सबने परम देवत्व तक पहुँचने और पारब्रह्म के साथ एकत्व हेतु, योग का अभ्यास किया;

 परंतु कृष्ण जन्म के पहले दिन से ही परम चेतना को धारणकर अलौकिक शक्तियों के स्वामी थे, अतः उन्हें पूर्णावतार कहते हैं; वह सच्चिदानंद की एक मानव शरीर के रूप में अभिव्यक्ति थे।

सनातन धर्म सच्चिदानंद स्वरूप का दर्शन है, देवी-देवता धर्म कदापि नही। इस भारतभूमि (“भा” अर्थार्त ज्ञान प्रकाश - “रत” अर्थार्त जुड़ा स्थल) को कोटि-कोटि नमन। 


हर मानव अपनी अनूठी शीर्ष यात्रा पर चल रहा है - योगेश्वर होने के लिए; अर्थात पारब्रह्म से योग हेतु।


जय महान  भारतवर्ष...

Wednesday, February 8, 2023

Personality Development Trainer/Faculty Job

 

Personality Development Trainer/Faculty

व्यक्तित्व विकास प्रशिक्षक/शिक्षक

Divine Life Solutions looking for an innovative PDP Trainer to design training programs for students who need more corporate training. The trainer must be good observant and have excellent analytical skills. A good trainer is able to use alternative teaching methods to cater to various individuals.

Trainer Responsibilities

●Making & delivering high-impact Presentations

●Overcoming fear or hesitation in speaking

●Developing Leadership and self-confidence in public speaking

●Comprehensive Soft Skills: Physical, Mental, Emotional and Spiritual Aspects of Personality Development

●Communication Skills expertise: Saying the right thing at the right time

●Mastering non-verbal communication: Powerful body language

●Effective voice projection, eye contact and gestures

●Success in Interviews and interactions

●The Power of Positive thinking and Attitude

●Achieving your goals

●Research new Teaching Methods.

●Attend Education Conferences.

Trainer Requirements:

● A Degree in Education or Training.

● Prior Experience as a Trainer or a Similar Position.

● Excellent Interpersonal and Communication Skills.

● Ability to Identify Gaps in Skills.

● Knowledge of Various Teaching Methods and Approaches.

● Excellent Organizational Skills

Must have Experience of Providing English Training in a Reputed Institute.

Salary will be Discussed in an Interview.

Job Type: Full-time

Salary: ₹20,000.00 - ₹25,000.00 Per Month

Benefits:

  • Food provided

Schedule:

  • Morning shift

Supplemental pay types:

  • Performance bonus

Ability to commute/relocate:

  • Bhopal,Madhya Pradesh-  Reliably commute or planning to relocate before starting work (Required)

Experience:

  • Total Work: 1 Year

Contact: Divine Life Solutions
utkarshfrom1998@gmail.com
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Thursday, January 26, 2023

वर्तमान में प्रौद्योगिकी एक आशीर्वाद है या अभिशाप ?

वर्तमान में प्रौद्योगिकी एक आशीर्वाद है या अभिशाप ? 

प्रौद्योगिकी यदि सुखद सुविधाजनक सहयोगी उपयोगितापूर्ण हो तो आशिर्वाद है लेकिन

आश्रित बना कर हमें दुखद ,अति, भोगवादिता, शोषक और अनियंत्रित हो तो अभिशाप बन सकती है।


वर्तमान आर्थिक साम्राज्यवादी वैश्विक परिदृश्य में भौतिक सुख सुविधा पाने की होड़ सी मची हुई है प्राकृतिक संसाधनों के लगातार दोहन से प्रकृति अस्तित्व पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया है। प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने कब्जा करने के लिए अनेकों देशों में परस्पर युद्ध जारी है। परिणामस्वरूप प्रौद्योगिकी विध्वंशक विनाशकारी साबित हो रही है।

दूसरी ओर सूचना विज्ञान प्रौद्योगिकी संचार माध्यम तकनीकी संपन्नता के चलते व्यक्ति का जीवन उपभोक्तावादी संस्कृति बाजारवाद भोगवाद के वशीभूत होकर अनुत्पादक अकर्मण्य श्रमविहीन हो गया है।

लोगों में आलस्य प्रमाद तनाव बढ़ता जा रहा है जिसके कारण लगातार मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ रहा है।

युवा बच्चें महिलाएं सभी इस सुचना प्रोद्योगिकी इंटरनेट संजाल, मोबाइल ऐप मकड़जाल तकनीकी के चलते अवसाद ग्रस्त तनाव ग्रस्त होते जा रहे हैं मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। इस प्रतिकूल सूचना संचार प्रौद्योगिकी के दुष्परिणाम स्वरूप स्वास्थ्य संबंधित घातक परिस्थितियां अभिशाप साबित हो रही है।

जबकि सूचना संचार प्रौद्योगिकी के विवेकशील उपयोग से ज्ञान संवर्धन तथा आध्यात्मिक उत्कर्ष की असीम संभावनाएं आज सहज रूप से उपलब्ध है।

सूचना प्रौद्योगिकी के ज्ञान विज्ञान को मनुष्य अपने जीवन में सर्वांगीण सकारात्मक प्रगति में उपयोग करके अपने लिए वरदान बना सकता है।

किंतु दुर्भाग्यवश प्रौद्योगिकी उपयोगिता के विषय में आज व्यक्ति केवल दोहन शोषण की जुगाड में लगा हुआ है। मनोरंजन,संकीर्ण मानसिकता, भोगवाद और विलासिता के दिखावे में उलझकर रह गया है।

यदि समय रहते समाज में व्याप्त सूचना प्रौद्योगिकी संचार प्रोद्योगिकी दुष्परिणाम के प्रति जागरुकता पैदा नही की गई तो लोगों में मानसिक रोग तेजी से फैलने लग जाएंगे इसके घातक दुष्परिणम बड़ते ही जाएंगे लोगों में संवेदनशील व्यवहार  विवेकशील आचरण समाप्त होता चला जाएगा।


आज हर व्यक्ति को सूचना प्रौद्योगिकी उपयोगिता के विषय में गंभीर रूप से इसके दुष्परिणाम के प्रति सजग  हो सम्यक उपयोग की समझ को अपनाना होगा। मोबाइल इंटरनेट की व्यसन रूपी लत को नियंत्रित करना होगा।अन्यथा स्व कुंठा अवसाद तनाव एवम परस्पर रिश्तों संबंधों में परिवार में टूटन अलगाव बिखराव बढ़ता ही चला जाएगा।

सूचना प्रौद्योगिकी उपयोगिता की समुचित समझ, पर्यावरण संरक्षण, मानवीय मूल्यों के रक्षण, वैश्विक समृद्धि की आध्यात्मिक शिक्षा देकर संयम योग संस्कृति समरसता सुनिश्चित करके ही मनुष्य के जीवन को वरदान बनाया जा सकता है।

🔸संपर्क🔸

डा सुरेंद्र सिंह विरहे

उप निदेशक

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी संस्कृति परिषद् संस्कृति विभाग

शोध समन्वयक

(आध्यात्मिक नैतिक मूल्य शिक्षा शोध)

धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग मध्य प्रदेश शासन

* मनोदैहिक आरोग्य आध्यात्मिक स्वास्थ्य विषेशज्ञ एवं लाईफ कोच, स्प्रिचुअल योगा थेरेपिस्ट*


स्थापना सदस्य

मध्य प्रदेश मैंटल हैल्थ एलाइंस चोइथराम हॉस्पिटल नर्सिंग कॉलेज इंदौर


निदेशक

दिव्य जीवन समाधान उत्कर्ष

Divine Life Solutions Utkarsh


पूर्व अध्येता (जे आर एफ)

भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद् दिल्ली

"Philosophy of Mind And Consciousness Studies"

Ex. Research Scholar

At: Indian Council of Philosophical Research ICPR Delhi



utkarshfrom1998@gmail.com


9826042177,

8989832149


Tuesday, November 29, 2022

सनातन धर्म हिंदू भारतीय संस्कृति आध्यात्म की प्रेरक मानवतावादी संस्कृति है!

 सनातन धर्म संस्कृति में आध्यात्मिक उत्कर्ष की अवधारणा: 


सनातन धर्म हिंदू भारतीय संस्कृति आध्यात्म की प्रेरक मानवतावादी संस्कृति है।

 ‘‘अध्यात्म का गंतत्य एवं मंतत्य है, शुद्ध चेतना में अवगाहन तथा सत्य का साक्षात्कार।’’ शुद्ध चेतना में अवगाहन का उद्देश्य है अपने ‘स्व’ में प्रतिष्ठित होना, तभी तो प्राचीन ऋषि कहता है ‘आत्मान विद्धि’ स्वयं को जानो।


 यह स्वयंं को जानना, जीवन के मूल सत्व में, स्नोत में प्रतिष्ठित होना है । स्वयं के साथ मित्रता करके सत्य का साक्षात्कार किया जा सकता है।


सनातन हिंदू धर्म के जितने भी धार्मिक ग्रंथ हैं, उन सभी के मूल में व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्कर्ष की कामना ही है,


 चाहे वह श्रीमद् भागवत हो, या रामायण हो या फिर महाभारत का विशाल ग्रंथ ही क्यों न हो। इन ग्रंथों में जितने भी कथानक हैं, उन सभी का अंतिम संदेश यही है कि मानव स्वयं को जाने और फिर जैसा स्वयं के प्रति दूसरों से व्यवहार की कामना करता है, वैसा ही व्यवहार वह दूसरों से करें । यही आध्यात्मिक दृष्टि है ।


 मानव का प्रकृति और सृष्टि के साथ तादात्म्य तथा उसके साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार ही अध्यात्म का अभीष्ट है। इसी दिशा में वैदिक ऋषि का आहवान है-


मित्रस्त्र मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीशन्ताम


मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे


सम्पूर्ण प्राणीमात्र मुझ से मित्र भाव रखें, तथापि मेरा भी यही कर्तव्य है कि मैं भी सम्पूर्ण सृष्टि तथा प्रकृति के प्रति मित्रता का भाव रखूं| यह भाव सदैव व्यक्ति के चरित्र और व्यवहार में बना रहें, यही आध्यात्म है इसी भाव को हमारे सभी धर्म ग्रंथों में बड़े ही अच्छे ढंग से विभिन्न आख्यानों और कथाओं के माध्यम से समझाने का प्रयत्न किया गया है, जिससे आध्यात्मिक विकार और ताप का शमन हो और चित्त निष्कपट, सरल और विशुद्ध होकर सबके कल्याण के लिए प्रवृत्त हो, यही धर्म है। 


श्रीमद् भागवत में महर्षि वेदव्यास ने यही बात कही है-


धर्म:- प्रोज्झितकतवो त्र परमो निर्मत्सराणां सताम


इसी आध्यात्मिक भाव को कठोपनिषद के ऋषि ने कहा है कि जो व्यक्ति शरीर, मन और बुद्धि से अपने अस्तित्व को जान लेता है और अपने स्व में प्रतिष्ठित हो जाता है तो उसे विशुद्ध आत्मानंद की अनुभूति होती है और वह आनंद शाश्‍वत होता है-


एक वशी सर्वमूतान्तरात्मा, एक रुप बहुदा य : करोति


तमात्म स्थं ये नुपश्यन्ति घारी:, तेषा सुख शाश्‍वंत नेत रेषाम


मानव के के अंत:करण की सभी प्रवृतियां निरंतर साधना एवं अभ्यास से जब विराट के साथ एकाकार होने के लिए प्रयत्न करती हैं, उससे प्रसूत आनंद ही अध्यात्म है।


भारतीय जीवन शैली अपने शुद्ध रूप में आध्यात्मिक ही है। उसका प्रत्येक तत्व व पहलू अध्यात्म से भाविक है और सृजित है और उसका लक्ष्य एक ही है सत्य का साक्षात्कार और स्वयं में सत्य का अविष्कार जिसको महापुरुषों ने विद्वानों ने, अपनी-अपनी दृष्टि से परिभाषित किया है और जानने की कोशिश भी की है।


भारतीय वैदिक वाङ्मय तथा संस्कृति इस सनातन आध्यात्मिक चेतना को एक नए दृष्टिबोध के साथ उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी भारत के राष्ट्र निर्माताओं और दार्शनिकों जिनमें स्वामी विवेकानंद, योगी श्री अरविंद, महात्मा गांधीजी, विनोबा भावे आदि प्रमुख हैं, ने प्रस्तुत किया। यह नवजागरण का मानवीय अध्यात्म था।


बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ का अध्यात्म दीप स्वामी विवेकानंद ने प्रकट किया था, जिसका प्रकाश अमेरिका तथा अन्य युरोपीय देशों तक पहुंचा था। स्वामी विवेकानंद जी ने वेदांत के तत्व को एक नई दृष्टि दी, जिससे केवल भारत ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्‍व आलोकित हो गया। स्वामी विवेकानंद ने तत्कालीन समाज में पीड़ित मानवता की सेवा में अपने अध्यात्म की खोज की। 


भारत की आध्यात्मिक परंपरा को उन्होंने ‘‘सेवा ही परमो धर्मः’’ में साकार किया । श्रीमद् भागवत के तृतीय स्कंध में कपिल मुनि द्वारा आध्यात्मिक सूत्र को देश के सामने रखा। 


कपिल मुनि द्वारा अपनी माता को जो आध्यात्मिक उपदेश दिया गया था, उसका मूल संदेश है कि परमात्मा प्रकृति के कण-कण में और सभी प्राणियों में विद्यमान है, यदि लोग प्राणिमात्र की सेवा बजाय केवल प्रतिमा में स्थूल पूजा- अर्चना करते हैं तो ऐसी उपासना केवल खोखला प्रदर्शन और दिखावा है।


अंह सर्व भूतषु भूतात्मावस्थित: सदा


तमवज्ञा मां मर्त्य: कुरुते र्चा विडाम्बनम


स्वामीजी ने भी राष्ट्र के सभी नवयुवकों का आह्वान करते हुए कहा था कि गरीबों, दलितों और वंचितों की सेवा करना ही परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ उपासना है। उन्होंने कहा, ‘‘मेरा बार-बार जन्म हो तथा मैं हजारों दु:खों को सहूं ताकि मैं उस एकमात्र परमात्मा की उपासना कर सकूं जिसका अस्तित्व है, वह एकमात्र जिसमें मुझे विश्‍वास है - सभी आत्माओं का सम्मिलित रूप और इनसे भी परे मेरा परमात्मा जो मूर्त में है, मेरा परमात्मा जो पीड़ितों में है, मेरा परमात्मा जो सभी जातियों, सभी नस्लों के निर्धनों में है- वही मेरी पूजा का विषय है।’’


भारतीय सनातन विचार दर्शन में जो बातें कहीं गई हैं, उसका सीधा सम्बंध अंतर्मन से है । इस दर्शन की धारणा है कि व्यक्ति अपने भीतरी मनोभावों से ही बाहर की प्रकृति और समाज के प्रति अपने व्यवहार और विचारों को कार्य रूप में परिणित करता है। ये विचार और व्यवहार ही जब लम्बे समय तक चलते हैं और लोगों द्वारा अपनाए जाने लगते हैं, तो वे ही जीवन मूल्य कहलाते हैं; क्योंकि वे मनुष्य की भीतरी आध्यात्मिक प्रकृति से उत्पन्न होते हैं।


अतएव विवेकानंद द्वारा सेवा को सर्वोपरि मानकर समाज के पुन: जागरण का आह्वान वास्तव में अध्यात्म से प्रसूत आंदोलन ही था।


श्रीमद् भागवत में कपिल मुनि द्वारा दूसरी महत्वपूर्ण जो बात कही गई, उसको स्वामीजी ने अपने कार्यों और आचरण से एक उदाहरण के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत किया और कहा कि भारत की उन्नति, प्रगति तथा उत्कर्ष के मूल में सेवा की सबसे प्रमुख भूमिका होगी।


कपिल मुनि के माध्यम से परमात्मा कहते हैं-


अथ मां र्वभूतेषु भूतात्मानं कृतालयम


अर्हयेद्यापमानमानाभ्यां मैत्र्या भिन्नेन चक्षुषा॥


अर्थात सभी प्राणियों में मेरी पूजा अर्चना करो, क्योंकि मैं सब में एकमेव आत्मा हूं और मैंने उनकी देह को अपना मंदिर बना लिया है, इसलिए मेरी पूजा करो, और यह पूजा दान के द्वारा लोगों के अभावों को, दु:खों को, अशिक्षा को दूर करके करिए, किंतु यह कार्य उनका आदर करते हूए करना चाहिए।


इसी सनातन आध्यात्मिक संदेश को स्वामी विवेकानंद ने अपने पुनर्जागरण का मुख्य उद्देश्य घोषित किया और राष्ट्र के नवयुवकों को मानवता की सेवा के लिए पूरी निष्ठा से जुट जाने को कहा।


 सनातन हिन्दू धर्म के मूल तत्व सेवा को पुन: प्रतिष्ठित करने का आवाहन करते हुए कहा, ‘‘मानव देह मंदिर में प्रतिष्ठित मानव आत्मा ही एकमात्र पुत्रार्थ भगवान है। अवश्य समस्त प्रणियों की देह भी मंदिर है, पर मानव देह सर्वश्रेष्ठ है, वह मंदिरों में सर्वश्रेष्ठ है। यदि मैं उसमें भगवान की पूजा न कर संकू, तो और कोई भी मंदिर किसी काम का न होगा।’’


अध्यात्म के इस सेवा तत्व को योगी अरविंद, महात्मा गांधी तथा विनोबा भावे ने सबसे प्रमुख माना। आचार्य विनोबा भावे के अनुसार ‘‘सत्य, संयम और सेवा के इन तीन सूत्रों में पारमार्थिक जीवन का अध्यात्म अंकुरित और पल्लवित होता है।


 श्रीमद् भगवतगीता, जो अध्यात्म तत्व का वैश्‍विक ग्रंथ है, उसके बारहवें अध्याय में श्री कृष्ण ने इसका बड़ा सुंदर विवेचन किया है। कृष्ण कहते हैं-


संनियम्यान्द्रिय ग्रामं सर्वत्र समबुद्धय:।


ते प्राप्तुवन्ति मामेव सर्वभूत हिते रता:|


जो व्यक्ति अपने इंद्रियों पर संयम रख कर जीवनयापन करते हैं औरसभी के प्रति समान दृष्टि रखते हैं, साथ ही प्राणीमात्र के कल्याण और सेवा में लोग रहते हैं, वे अंततोगत्वा मुझे ही अर्थात परमात्मा को प्राप्त होते हैं।


 आज जब इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक के उत्तरार्ध में मानव विज्ञान, टेक्नालाजी के उत्कर्ष के कारण समस्त सुविधाओं और संसाधनों से परिपूर्ण जीवन जी रहा है, ऐसे समय में भी मानवता को आतंक, अत्याचार, हिंसा, आक्रोश से छुटकारा नहीं मिल रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था में सभी प्रकार की सुख सुविधाओं और विपुल उपग्रह पर केवल कुछ मुट्ठीभर लोग ही भौतिक सुख का लाभ उठा पा रहे हैं, दूसरी ओर करोड़ों लोग शारीरिक कुपोषण, रोग और अन्नान्य व्याधियों से ग्रस्त हैं।


किंतु जो लोग भौतिक सुख संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं, वे आध्यात्मिक कुपोषण से ग्रस्त है और यही कारण है कि सारा विश्‍व बारूद के ढेर पर बैठा है।


 जिस प्रकार से विश्‍व में आतंकवाद ने पैर पसारा है और स्थान-स्थान पर हिंसा का ताडंव हो रहा है, उससे यह निश्‍चित संकेत मिल रहे हैं कि यदि इन खतरों से बचने के लिए कोई सुनिश्‍चित प्रयत्न नहीं किए गए तो विनाश सुनिश्‍चित है। 


कई वर्ष पहले बटेर्रण्ड रसेल ने इस बात को जान लिया था, यद्यपि वे अनीश्‍वरवादी थे, आध्यात्मिकता में बहुत विश्‍वास नहीं था, फिर भी उन्होंने अध्यात्म और जीवन मूल्यों के महत्व को समझा था और कहा था‘‘जीवन मूल्य कोई यांत्रिक वस्तु नहीं है, मशीन शैतान का आधुनिक रूप है और इसकी पूजा अर्थात पैशाचिकता - चाहे प्रत्येक वस्तु मशीनी हो जाए किंतु जीवन मूल्य यांत्रिक या मशीनी नहीं हो सकते और यह एक ऐसी बात है जो किसी को भी नहीं भूलनी चाहिए|’’


सम्पूर्ण विश्‍व में आध्यात्मिक आंदोलन को चलाने की आवश्यकता और उसमें भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वामी विवेकानंद ने आज से कई वर्ष पहले अनुभव कर लिया था, तभी उन्होंने उस समय कहा था, ‘‘मेरे राष्ट्र का प्रमुख तत्व है यह लोकातीतवाद अर्थात अध्यात्म, पार जाने का यह संघर्ष, प्रकृति के मुखौटे को उतार देने का यह साहस और किसी भी कोमल तथा किसी भी प्रकार के खतरे को उठा कर उस पार की झलक पा लेना-क्या तुम इस भाव को प्रोत्साहित करना चाहते हो। ऐसा करने का एक ही रास्ता है कि राजनीति और सामाजिक पुननिर्माण के बारे तुम्हारे भाषण और पैसा कमाने के ढंग के बजाए तुम्हें संसार को आध्यात्मिक ज्ञान देना है।


 वेदांत की विचारधाराओं का प्रचार करना होगा, इन्हें न केवल जंगल और गुफाओं में वरन वकीलों और न्यायाधीशों, मंदिरों, गरीब की कुटिया, मछली पकड़ने वाले मछुआरों और विद्यार्थियों तक इस संदेश को पहुंचना होगा।’’


आधुनिक युग के कई पश्‍चिमी विचारकों ने भी अध्यात्म के इस अवदान के लिए भारत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है।


प्रसिद्ध अमेरिकी इतिहासकार बिल ड्यूटेंट ने अपने ग्रंथ ‘स्टोरी आफ सिविलाइजेशन’ के पहले खण्ड में ‘अवर ओरियंटल हेरिटेज’ शीर्षक में बताया कि ‘भारत हमें परिपक्व बुद्धि, सहनशीलता और शालीनता, अपरिग्रह, संतोष, शांति तथा सभी प्राणियों एवं प्रकृति के प्रति एकता और प्रेम की शिक्षा देने का सामर्य्थ रखता है।’ यही अध्यात्म है, जिसकी परिणति सेवा में होती है।


मानव जीवन में आध्यात्मिक दृष्टिबोध की आवश्यकता को आज बड़ी ही गहनता से अनुभव किया जा रहा है। सभी प्रकार की सुख सुविधाओं तथा संसाधनों के बावजूद जीवन में जो रिक्तता और खालीपन पैदा हो रहा है, उससे सामाजिक और वैयक्तिक जीवन बिखर रहा है।


जीवन को सफलता तथा शांति के साथ जीने के लिए विश्‍व प्रसिद्ध आध्यात्मिक विचारक दीपक चोपड़ा की एक बहुत प्रसिद्ध पुस्तक है, जिसका नाम है ‘दि सेवन स्प्रिचुअल लॉज ऑफ सक्सेस’ अर्थात सफलता के सात आध्यात्मिक नियम। उसकी भूमिका में वे लिखते हैं कि यह वास्तव में सफलता के नहीं बल्कि जीवन के आध्यात्मिक नियम हैं।उनका कहना है कि जब व्यक्ति को अपने जीवन में ईश्‍वरत्व की अद्भुत अभिव्यक्ति का अनुभव होने लगताहै तभी सफलता का सही अर्थ समझ में आता है। पुस्तक के अंत में वह पाठक से तीन वचन देने की बात कहते हैं। 


ये तीनों ही वचन आध्यात्मिक दृष्टिबोध से ओतपोत हैं। वे पहले वचन के बारे में कहते हैं -अहंकार को छोड़ कर अपने आध्यात्मिक प्रयासों से अपनी श्रेष्ठता को खोजने का वचन। दूसरा- व्यक्ति अपने भीतर प्रवेश करके अपनी असाधारण योग्यता का आविष्कार करने का वचन और तीसरा तथा सबसे महत्वपूर्ण यह कि व्यक्ति मानवता के कल्याण के लिए कैसे सहायक हो सकता है, इस प्रश्‍न का स्वयं उत्तर खोज कर व्यक्ति जब अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं के साथ तालमेल बैठा कर दूसरों की सेवा और सहायता के लिए स्वयं प्रेरित होता है तो यह अध्यात्म की परिणति है।


अध्यात्म का अर्थ है अपने स्वयं के अंदर देवत्व की खोज और दूसरे को देवता मान कर उसकी सेवा और अर्चना करना।


स्वास्थ्य क्या है ? 


स्वास्थ्य की सटीक परिभाषा आयुर्वेद में प्राप्त होती है। वहां कहा गया है: समदोष: समाग्निश्च समधातु मल क्रिय:। प्रसन्नात्येन्दिय मन: स्वस्थ इत्यभिधीयते।। 


अर्थात् वह व्यक्ति स्वस्थ है जिसके तीनों दोष- वात, पित्त, कफ ठीक प्रकार से कार्य कर रहे हों। इसके साथ-साथ उसकी अग्नियां सम हों। अग्नियां 13 प्रकार की होती हैं: सात धात्वाग्नि, पांच भूताग्नि और एक जठराग्नि। भूख ठीक लगती हो और भोजन का पाचन अच्छा होता हो। सातों धातुओं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र) का निर्माण ठीक हो रहा हो। मल, मूत्र, पसीना आदि सही प्रकार से बाहर निकल रहे हो।


 अर्थात् शरीर में किसी प्रकार का रोग अथवा असंतुलन न हो। साथ ही, व्यक्ति की सभी इन्दियां (पाँचों ज्ञानेन्दियां व पांचों कर्मेन्द्रियां), मन व आत्मा प्रसन्न हों, तो ऐसे व्यक्ति को स्वस्थ कहा जाता है।


अत: स्वास्थ्य का अर्थ केवल शारीरिक या मानसिक आरोग्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक आरोग्य भी है। इस संबंध में यह भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति जितना अंतर्मुखी होगा, उतना ही ज्यादा स्वस्थ होगा। 


आज के भौतिक सुख सुविधा तकनीकी संपन्नता के सूचना प्रौद्योगिकी संचार संजाल परिवेश के हिसाब से मनुष्य ज्यादा बहिर्मुखी होता जा रहा है। इस कारण अधिकतर लोग अस्वस्थ हो रहे। 


वस्तुतः शरीर के रोगों का नाश करने की शक्ति हमारे अंदर ही है। बस उसे कुछ क्रियाओं के द्वारा बढ़ाना और पहचानना होता है। ऐसा करने से व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। अंदर की शक्तियों का जागरण आध्यात्मिक जागृति से संभव है।


आज चिकित्सा के क्षेत्र में पहले के मुकाबले बेहतर सुविधाएं, दवा और उपकरण उपलब्ध हैं, फिर भी रोगों पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? यह सही है कि पहले की अपेक्षा आज चिकित्सा के क्षेत्र में नए-नए शोध हो रहे हैं, रोगों पर काबू नहीं होने और नए घातक रोगों के सिर उठाने का कारण यह है कि हम अपने आंतरिक स्वरूप के साथ नहीं जुड़ पा रहे हैं।


जब तक हम अध्यात्म की दिशा में आगे नहीं बढ़ेंगे, तब तक रोग के घेरे में रहेंगे। इसलिए आज आध्यात्मिक स्वास्थ्य की अत्यधिक जरूरत है। अगर आध्यात्मिक स्वास्थ्य हासिल हो जाए, तो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य आसानी से प्राप्त हो जाता है।


आध्यात्मिक स्वास्थ्य से क्या तात्पर्य है? 


सनातन धर्म दृष्टि से देखें तो अपने स्वरूप में स्थित हो जाना ही आध्यात्मिक स्वास्थ्य है। यह बहुत उच्च स्थिति है। अपने स्वरूप में स्थित होना सरल बात नहीं है। इसके लिए पहले अपने स्वरूप को पहचानना होगा और उसका अनुभव करना होगा। अपने भीतर से जुड़ना होगा। 


आज सामान्यतया व्यक्ति परिवार से, धन-दौलत से, जमीन-जायदाद से, रिश्ते-नातों से ओपचारिक रूप से जुड़ता है। गहराई में देखा जाए तो वह अपने से बाहर दिखाई देने वाले शरीर से जुड़ता है। यह जुड़ना वास्तविक जुड़ना नहीं है, क्योंकि यह सब तो एक दिन छूट ही जाना है। 


स्वयं के असली स्वरूप को पहचानने के लिए बाहर का सब कुछ जाना हुआ, याद किया हुआ, पाया हुआ, बाहर ही छोड़कर शांत भाव से स्थिर हो जाना होता है। जब तक बाहर का छूटेगा नहीं, तब तक भीतर का दिव्य आत्मदर्शन मिलेगा नहीं। यह स्थिति निर्विचार की अवस्था है। इसे ध्यान की अवस्था भी कहा गया है। यह स्थिति आध्यात्मिक स्वास्थ्य की अवस्था है।


आध्यात्मिक स्वास्थ्य उपलब्धि की इस अवस्था में दृष्टा अपने ही स्वरूप में स्थित हो जाता है। जब साधक एक बार अपने स्वरूप का दर्शन कर लेता है, तब उसके भीतरी मन के मलों का नाश होने लगता है।


अनुकूलता स्थापित हो जाती है जैसे कि काम, क्रोध, लोभ और मोह उसे सताते नहीं हैं। चिंता, चिंतन में बदल जाती है। तनाव, शांति में। सुख-दुख, आनन्द में। निराशा, प्रसन्नता में। घृणा, प्रेम में तब्दील हो जाता है। हिंसा, करुणा में। झूठ, सत्य में। कामवासना, ब्रह्मचर्य में। चोरी का भाव अस्तेय में। इच्छाएं संतुष्टि में। वाणी का तीखापन कोमलता में। आहार मिताहार हो जाता है। सबके साथ मित्रता व प्रेम का भाव आ जाता है, फिर न कोई शोक होता है, न रोग होता है। अवगुणों, मलिनताओं, दुखों का स्वत: ही नाश होने लगता है। 


आध्यात्मिक स्वास्थय द्वारा आरोग्य प्राप्त ऐसे व्यक्ति के लिए फिर भी कुछ अशुभ नहीं होता, क्योंकि वह आत्मदर्शन कर चुका होता है। शरीर को स्वस्थ रखने का उसका थोड़ा प्रयास भी सार्थक सिद्ध होता है। ऐसे में योग की साधना पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करने वाली सिद्ध होती है।


अतः हम किसी भी धर्म के मानने वाले हों और ईश्वर के किसी भी स्वरुप पर आस्था रखते हों, इन सबके मूल में निहित अध्यात्म हमें स्वस्थ रहने की प्रेरणा देता है ।


 सदियों पूर्व आयुर्वेद के मनीषी सुश्रुत ने स्वास्थ्य को परिभाषित करते समय "सम दोषः समअग्निः समधातु: मल: क्रियाः प्रसन्नआत्मइन्द्रियः मनः स्वस्थमितिधीयते ! कहकर स्पष्ट की थी ।


वर्तमान के कुछ शोध से यह बात और अधिक पुख्ता साबित हुई है कि व्यक्ति की धार्मिक आस्था और विश्वास उसकी पर्सनालिटी के लिए जिम्मेदार होता है ।


वैज्ञानिक डान कोहेन, एसिस्टेंट प्रोफ़ेसर,रेलीजीयस स्टडीज, यूनिवर्सीटी आफ मिसौरी के अनुसार आध्यात्मिक चेतना विकसित होने पर व्यक्ति स्वयं ( मैं) के भाव से दूर होता हुआ विस्तृत एकात्म चिंतन अर्थात ब्रह्माण्ड से अपने जुड़ाव (एकात्मकता ) को महसूस करने लगता है ।


वर्तमान शोध के परिणामों में यह बात साफ़ देखी गयी कि इन सभी धर्मावलम्बियों में पायी गयी प्रचुर आध्यात्मिक चेतना उनके अच्छे मानसिक स्वास्थ्य से सीधे समबंधित थी । इससे पूर्व के कई शोध में भी यह पाया गया था कि सकारात्मक आध्यात्मिक चेतना व्यक्ति को विभिन्न घातक अवस्थाओं जैसे: कैंसर,रीढ़ की हड्डी की चोट या दिमागी चोट से उबरने में काफी मददगार होती है .. 


अतःसनातन धर्म संस्कृति में आस्था और विश्वास का मूल इसके अन्दर निहित आध्यात्म है जो हमें मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करने के साथ-साथ गंभीर परिस्थितियों को सरलता से जूझने में मददगार होता है साथ ही व्यक्ति आध्यात्मिक स्वास्थ्य उपलब्धि अर्जित करके अपने जीवन में सर्वांगीण प्रगति प्राप्त करके आत्म उत्कर्ष की ओर अग्रसर होता है।


🔸संपर्क🔸


 डा सुरेंद्र सिंह विरहे


उप निदेशक


मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी संस्कृति परिषद् भोपाल


शोध समन्वयक


आध्यात्मिक नैतिक मूल्य शिक्षा शोध


धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग मध्य प्रदेश शासन


 मनोदैहिक आरोग्य आध्यात्मिक स्वास्थ्य विषेशज्ञ एवं लाईफ कोच, स्प्रिचुअल योगा थेरेपिस्ट

आध्यात्मिक स्वास्थ्य विज्ञान का उत्कर्ष सिद्धान्त एवं दिव्य जीवन समाधान

आध्यात्मिक स्वास्थ्य विज्ञान का उत्कर्ष सिद्धान्त एवं दिव्य जीवन समाधान ..

सनातन धर्म संस्कृति के अंतर्गत स्वास्थ्य एवं जीवनायापन की दृष्टि से आत्म-साधकों का जीवन मूलभुत रूप से प्राणी मात्र के प्रति करुणा, दया और अनुकम्पा, ‘‘सर्व जीव हिताय, सर्व जीव सुखाय’’ की लोकोक्ति को सार्थक करने का होता है। उनके कर्म योग और साधना का मूल उद्देष्य आत्मा को निर्मल, शुद्ध, पवित्र बनाना होता है। अर्थात् आत्म-पोषण का होता है।

हठ योग साधना में भले ही उन्हें कभी-कभी उसके लिए शरीर को कष्ट ही क्यों न देना पड़े? उनके जीवन में क्रोध, मान, माया, लोभरुपी कषायों की मन्दता होने से वे अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में परेशान नहीं होते। उनमें प्रायः मानसिक आवेग नहीं आते जो हमारी अन्तःस्रावी ग्रन्थियों को प्रभावित कर रोग का मुख्य कारण होते हैं। 

प्रायः ऐसे व्यक्ति सहनशील, सहिष्णु निर्भीक, और धैर्यवान होते है। वाणी में विवेक और मधुरता का सदैव ख्याल रखते हैं। उनका उद्देष्य होता है जीवन में चिरस्थायी आनन्द, शक्ति एवं स्वाधीनता की प्राप्ति। वे स्वयं के द्वारा स्वयं से अनुशासित होते हैं। उनका जीवन शान्त, सन्तोषी, संयमी, सहज, संतुलित एवं सरल होता है। विचारों में अनेकान्तता, भावों में मैत्री, करूणा, प्रमोद तथा मध्यस्थता अर्थात् सहजता, स्वदोष-दृष्टि, सजगता, सहनशीलता, सहिष्णुता, दया, सरलता, सत्य, विवेक, संयम, नैतिकता आदि गुणों का प्रादुर्भाव होता है। 

जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति के जीवन में अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में समभाव, निस्पृहता, अनासक्ति विकसित होती है। व्यक्ति निर्भय, तनाव मुक्त बन जाता है। वाणी में सत्य के प्रति निष्ठा, सभी जीवों के प्रति दया, करूणा, मैत्री, परोपकार जैसी भावना और मधुरता प्रतिध्वनित होने लगती है। व्यक्ति का मनोबल और आत्मबल विकसित होने लगता है। व्यक्ति स्वावलम्बी, स्वाधीन बनने लगता है।

आध्यात्मिक स्वास्थ्य विज्ञान का उत्कर्ष सिद्धान्त एवं दिव्य जीवन समाधान  दर्शन

भारत की सनातन हिंदू संस्कृति और जीवन पद्धति के मूल में अध्यात्म है। अध्यात्म का अर्थ है आत्मनि अधि अर्थात अपने भीतर। मानव शरीर के अंदर की जो भी भाव स्थितियां हैं वह अध्यात्म है। 

शरीर में दो प्रकार की भाव स्थितियां होती हैं - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर लेकिन उसके विपरीत गुणों के रुप में शांति, करुणा, दया, त्याग, प्रेम, सहिष्णुता सहयोग की भावना भी मानव के स्वभाव का दूसरा पहलू है।

 जब मानव काम, क्रोध, लोभ, मोह, अंहकार से ग्रस्त होकर कोई कार्य करता है तो वह आध्यात्मिक ताप होता है, जिसकी परिणति दु:ख तथा निराशा में होती है, किन्तु जब मनुष्य में करुणा, दया, त्याग की भावना जागृत होती है और उससे प्रेरित होकर जब वह कोई कार्य करता है, तो उससे जो आनंद या प्रसन्नता मिलती है, वह आध्यात्मिक सुख कहलाता है।

अतएव भारतीय चिंतकों तथा वैदिक ऋषियों ने मानव जीवन को सुखी और शांतिपूर्ण बनाए रखने के लिए दैव आध्यात्मिक स्तर पर मनुष्य की चेतना को विकसित करने का प्रयास किया है।

 यह सभी जीवन में आध्यात्मिक ताप से सदैव मुक्त रहे और आध्यात्मिक दृष्टि से अर्थात आंतरिक रुप से मनुष्य सदैव नि:श्रेयस भाव से अपने अभ्युदय के मार्ग पर चले, यही भारतीय संस्कृति और जीवन दर्शन का मूल आधार रहा है। यही कारण है कि भारतीय मनीषा में सदैव मानव आध्यात्मिक उत्कर्ष को सबसे अधिक महत्व दिया गया है।

सनातन धर्म संस्कृति में आध्यात्मिक उत्कर्ष की  अवधारणा: 

भारतीय संस्कृति आध्यात्म की संस्कृति है। ‘‘अध्यात्म का गंतत्य एवं मंतत्य है, शुद्ध चेतना में अवगाहन तथा सत्य का साक्षात्कार।’’ शुद्ध चेतना में अवगाहन का उद्देश्य है अपने ‘स्व’ में प्रतिष्ठित होना, तभी तो प्राचीन ऋषि कहता है ‘आत्मान विद्धि’ स्वयं को जानो।

 यह स्वयंं को जानना, जीवन के मूल सत्व में, स्नोत में प्रतिष्ठित होना है । स्वयं के साथ मित्रता करके सत्य का साक्षात्कार किया जा सकता है।

सनातन हिंदू धर्म के जितने भी धार्मिक ग्रंथ हैं, उन सभी के मूल में व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्कर्ष की कामना ही है,

 चाहे वह श्रीमद् भागवत हो, या रामायण हो या फिर महाभारत का विशाल ग्रंथ ही क्यों न हो। इन ग्रंथों में जितने भी कथानक हैं, उन सभी का अंतिम संदेश यही है कि मानव स्वयं को जाने और फिर जैसा स्वयं के प्रति दूसरों से व्यवहार की कामना करता है, वैसा ही व्यवहार वह दूसरों से करें । यही आध्यात्मिक दृष्टि है ।

 मानव का प्रकृति और सृष्टि के साथ तादात्म्य तथा उसके साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार ही अध्यात्म का अभीष्ट है। इसी दिशा में वैदिक ऋषि का आहवान है-

मित्रस्त्र मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीशन्ताम

मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे

सम्पूर्ण प्राणीमात्र मुझ से मित्र भाव रखें, तथापि मेरा भी यही कर्तव्य है कि मैं भी सम्पूर्ण सृष्टि तथा प्रकृति के प्रति मित्रता का भाव रखूं| यह भाव सदैव व्यक्ति के चरित्र और व्यवहार में बना रहें, यही आध्यात्म है  इसी भाव को हमारे सभी धर्म ग्रंथों में बड़े ही अच्छे ढंग से विभिन्न आख्यानों और कथाओं के माध्यम से समझाने का प्रयत्न किया गया है, जिससे आध्यात्मिक विकार और ताप का शमन हो और चित्त निष्कपट, सरल और विशुद्ध होकर सबके कल्याण के लिए प्रवृत्त हो, यही धर्म है। 

श्रीमद् भागवत में महर्षि वेदव्यास ने यही बात कही है-

धर्म:- प्रोज्झितकतवो त्र परमो निर्मत्सराणां सताम

इसी आध्यात्मिक भाव को कठोपनिषद के ऋषि ने कहा है कि जो व्यक्ति शरीर, मन और बुद्धि से अपने अस्तित्व को जान लेता है और अपने स्व में प्रतिष्ठित हो जाता है तो उसे विशुद्ध आत्मानंद की अनुभूति होती है और वह आनंद शाश्‍वत होता है-

एक वशी सर्वमूतान्तरात्मा, एक रुप बहुदा य : करोति

तमात्म स्थं ये नुपश्यन्ति घारी:, तेषा सुख शाश्‍वंत नेत रेषाम

मानव के के अंत:करण की सभी प्रवृतियां निरंतर साधना एवं अभ्यास से जब विराट के साथ एकाकार होने के लिए प्रयत्न करती हैं, उससे प्रसूत आनंद ही अध्यात्म है।

भारतीय जीवन शैली अपने शुद्ध रूप में आध्यात्मिक ही है। उसका प्रत्येक तत्व व पहलू अध्यात्म से भाविक है और सृजित है और उसका लक्ष्य एक ही है सत्य का साक्षात्कार और स्वयं में सत्य का अविष्कार जिसको महापुरुषों ने विद्वानों ने, अपनी-अपनी दृष्टि से परिभाषित किया है और जानने की कोशिश भी की है।

भारतीय वैदिक वाङ्मय तथा संस्कृति इस सनातन आध्यात्मिक चेतना को एक नए दृष्टिबोध के साथ उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी भारत के राष्ट्र निर्माताओं और दार्शनिकों जिनमें स्वामी विवेकानंद, योगी श्री अरविंद, महात्मा गांधीजी, विनोबा भावे आदि प्रमुख हैं, ने प्रस्तुत किया। यह नवजागरण का मानवीय अध्यात्म था।

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ का अध्यात्म दीप स्वामी विवेकानंद ने प्रकट किया था, जिसका प्रकाश अमेरिका तथा अन्य युरोपीय देशों तक पहुंचा था। स्वामी विवेकानंद जी ने वेदांत के तत्व को एक नई दृष्टि दी, जिससे केवल भारत ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्‍व आलोकित हो गया। स्वामी विवेकानंद ने तत्कालीन समाज में पीड़ित मानवता की सेवा में अपने अध्यात्म की खोज की। 

भारत की आध्यात्मिक परंपरा को उन्होंने ‘‘सेवा ही परमो धर्मः’’ में साकार किया । श्रीमद् भागवत के तृतीय स्कंध में कपिल मुनि द्वारा आध्यात्मिक सूत्र को देश के सामने रखा। 

कपिल मुनि द्वारा अपनी माता को जो आध्यात्मिक उपदेश दिया गया था, उसका मूल संदेश है कि परमात्मा प्रकृति के कण-कण में और सभी प्राणियों में विद्यमान है, यदि लोग प्राणिमात्र की सेवा बजाय केवल प्रतिमा में स्थूल पूजा- अर्चना करते हैं तो ऐसी उपासना केवल खोखला प्रदर्शन और दिखावा है।

अंह सर्व भूतषु भूतात्मावस्थित: सदा

तमवज्ञा मां मर्त्य: कुरुते र्चा विडाम्बनम

स्वामीजी ने भी राष्ट्र के सभी नवयुवकों का आह्वान करते हुए कहा था कि गरीबों, दलितों और वंचितों की सेवा करना ही परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ उपासना है। उन्होंने कहा, ‘‘मेरा बार-बार जन्म हो तथा मैं हजारों दु:खों को सहूं ताकि मैं उस एकमात्र परमात्मा की उपासना कर सकूं जिसका अस्तित्व है, वह एकमात्र जिसमें मुझे विश्‍वास है - सभी आत्माओं का सम्मिलित रूप और इनसे भी परे मेरा परमात्मा जो मूर्त में है, मेरा परमात्मा जो पीड़ितों में है, मेरा परमात्मा जो सभी जातियों, सभी नस्लों के निर्धनों में है- वही मेरी पूजा का विषय है।’’

भारतीय सनातन विचार दर्शन में जो बातें कहीं गई हैं, उसका सीधा सम्बंध अंतर्मन से है । इस दर्शन की धारणा है कि व्यक्ति अपने भीतरी मनोभावों से ही बाहर की प्रकृति और समाज के प्रति अपने व्यवहार और विचारों को कार्य रूप में परिणित करता है। ये विचार और व्यवहार ही जब लम्बे समय तक चलते हैं और लोगों द्वारा अपनाए जाने लगते हैं, तो वे ही जीवन मूल्य कहलाते हैं; क्योंकि वे मनुष्य की भीतरी आध्यात्मिक प्रकृति से उत्पन्न होते हैं।

अतएव विवेकानंद द्वारा सेवा को सर्वोपरि मानकर समाज के पुन: जागरण का आह्वान वास्तव में अध्यात्म से प्रसूत आंदोलन ही था।

श्रीमद् भागवत में कपिल मुनि द्वारा दूसरी महत्वपूर्ण जो बात कही गई, उसको स्वामीजी ने अपने कार्यों और आचरण से एक उदाहरण के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत किया और कहा कि भारत की उन्नति, प्रगति तथा उत्कर्ष के मूल में सेवा की सबसे प्रमुख भूमिका होगी।

कपिल मुनि के माध्यम से परमात्मा कहते हैं-

अथ मां र्वभूतेषु भूतात्मानं कृतालयम

अर्हयेद्यापमानमानाभ्यां मैत्र्या भिन्नेन चक्षुषा॥

अर्थात सभी प्राणियों में मेरी पूजा अर्चना करो, क्योंकि मैं सब में एकमेव आत्मा हूं और मैंने उनकी देह को अपना मंदिर बना लिया है, इसलिए मेरी पूजा करो, और यह पूजा दान के द्वारा लोगों के अभावों को, दु:खों को, अशिक्षा को दूर करके करिए, किंतु यह कार्य उनका आदर करते हूए करना चाहिए।

इसी सनातन आध्यात्मिक संदेश को स्वामी विवेकानंद ने अपने पुनर्जागरण का मुख्य उद्देश्य घोषित किया और राष्ट्र के नवयुवकों को मानवता की सेवा के लिए पूरी निष्ठा से जुट जाने को कहा।

 सनातन हिन्दू धर्म के मूल तत्व सेवा को पुन: प्रतिष्ठित करने का आवाहन करते हुए कहा, ‘‘मानव देह मंदिर में प्रतिष्ठित मानव आत्मा ही एकमात्र पुत्रार्थ भगवान है। अवश्य समस्त प्रणियों की देह भी मंदिर है, पर मानव देह सर्वश्रेष्ठ है, वह मंदिरों में सर्वश्रेष्ठ है। यदि मैं उसमें भगवान की पूजा न कर संकू, तो और कोई भी मंदिर किसी काम का न होगा।’’

अध्यात्म के इस सेवा तत्व को योगी अरविंद, महात्मा गांधी तथा विनोबा भावे ने सबसे प्रमुख माना। आचार्य विनोबा भावे के अनुसार ‘‘सत्य, संयम और सेवा के इन तीन सूत्रों में पारमार्थिक जीवन का अध्यात्म अंकुरित और पल्लवित होता है।

 श्रीमद् भगवतगीता, जो अध्यात्म तत्व का वैश्‍विक ग्रंथ है, उसके बारहवें अध्याय में श्री कृष्ण ने इसका बड़ा सुंदर विवेचन किया है। कृष्ण कहते हैं-

संनियम्यान्द्रिय ग्रामं सर्वत्र समबुद्धय:।

ते प्राप्तुवन्ति मामेव सर्वभूत हिते रता:|

जो व्यक्ति अपने इंद्रियों पर संयम रख कर जीवनयापन करते हैं और सभी के प्रति समान दृष्टि रखते हैं, साथ ही प्राणीमात्र के कल्याण और सेवा में लोग रहते हैं, वे अंततोगत्वा मुझे ही अर्थात परमात्मा को प्राप्त होते हैं।

 आज जब इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक के उत्तरार्ध में मानव विज्ञान, टेक्नालाजी के उत्कर्ष के कारण समस्त सुविधाओं और संसाधनों से परिपूर्ण जीवन जी रहा है, ऐसे समय में भी मानवता को आतंक, अत्याचार, हिंसा, आक्रोश से छुटकारा नहीं मिल रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था में सभी प्रकार की सुख सुविधाओं और विपुल उपग्रह पर केवल कुछ मुट्ठीभर लोग ही भौतिक सुख का लाभ उठा पा रहे हैं, दूसरी ओर करोड़ों लोग शारीरिक कुपोषण, रोग और अन्नान्य व्याधियों से ग्रस्त हैं।

किंतु जो लोग भौतिक सुख संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं, वे आध्यात्मिक कुपोषण से ग्रस्त है और यही कारण है कि सारा विश्‍व बारूद के ढेर पर बैठा है।

 जिस प्रकार से विश्‍व में आतंकवाद ने पैर पसारा है और स्थान-स्थान पर हिंसा का ताडंव हो रहा है, उससे यह निश्‍चित संकेत मिल रहे हैं कि यदि इन खतरों से बचने के लिए कोई सुनिश्‍चित प्रयत्न नहीं किए गए तो विनाश सुनिश्‍चित है। 

कई वर्ष पहले बटेर्रण्ड रसेल ने इस बात को जान लिया था, यद्यपि वे अनीश्‍वरवादी थे, आध्यात्मिकता में बहुत विश्‍वास नहीं था, फिर भी उन्होंने अध्यात्म और जीवन मूल्यों के महत्व को समझा था और कहा था‘‘जीवन मूल्य कोई यांत्रिक वस्तु नहीं है, मशीन शैतान का आधुनिक रूप है और इसकी पूजा अर्थात पैशाचिकता - चाहे प्रत्येक वस्तु मशीनी हो जाए किंतु जीवन मूल्य यांत्रिक या मशीनी नहीं हो सकते और यह एक ऐसी बात है जो किसी को भी नहीं भूलनी चाहिए|’’

सम्पूर्ण विश्‍व में आध्यात्मिक आंदोलन को चलाने की आवश्यकता और उसमें भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वामी विवेकानंद ने आज से कई वर्ष पहले अनुभव कर लिया था, तभी उन्होंने उस समय कहा था, ‘‘मेरे राष्ट्र का प्रमुख तत्व है यह लोकातीतवाद अर्थात अध्यात्म, पार जाने का यह संघर्ष, प्रकृति के मुखौटे को उतार देने का यह साहस और किसी भी कोमल तथा किसी भी प्रकार के खतरे को उठा कर उस पार की झलक पा लेना-क्या तुम इस भाव को प्रोत्साहित करना चाहते हो। ऐसा करने का एक ही रास्ता है कि राजनीति और सामाजिक पुननिर्माण के बारे तुम्हारे भाषण और पैसा कमाने के ढंग के बजाए तुम्हें संसार को आध्यात्मिक ज्ञान देना है।

 वेदांत की विचारधाराओं का प्रचार करना होगा, इन्हें न केवल जंगल और गुफाओं में वरन वकीलों और न्यायाधीशों, मंदिरों, गरीब की कुटिया, मछली पकड़ने वाले मछुआरों और विद्यार्थियों तक इस संदेश को पहुंचना होगा।’’

आधुनिक युग के कई पश्‍चिमी विचारकों ने भी अध्यात्म के इस अवदान के लिए भारत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है।

प्रसिद्ध अमेरिकी इतिहासकार बिल ड्यूटेंट ने अपने ग्रंथ ‘स्टोरी आफ सिविलाइजेशन’ के पहले खण्ड में ‘अवर ओरियंटल हेरिटेज’ शीर्षक में बताया कि ‘भारत हमें परिपक्व बुद्धि, सहनशीलता और शालीनता, अपरिग्रह, संतोष, शांति तथा सभी प्राणियों एवं प्रकृति के प्रति एकता और प्रेम की शिक्षा देने का सामर्य्थ रखता है।’ यही अध्यात्म है, जिसकी परिणति सेवा में होती है।

मानव जीवन में आध्यात्मिक दृष्टिबोध की आवश्यकता को आज बड़ी ही गहनता से अनुभव किया जा रहा है। सभी प्रकार की सुख सुविधाओं तथा संसाधनों के बावजूद जीवन में जो रिक्तता और खालीपन पैदा हो रहा है, उससे सामाजिक और वैयक्तिक जीवन बिखर रहा है।

जीवन को सफलता तथा शांति के साथ जीने के लिए विश्‍व प्रसिद्ध आध्यात्मिक विचारक दीपक चोपड़ा की एक बहुत प्रसिद्ध पुस्तक है, जिसका नाम है ‘दि सेवन स्प्रिचुअल लॉज ऑफ सक्सेस’ अर्थात सफलता के सात आध्यात्मिक नियम। उसकी भूमिका में वे लिखते हैं कि यह वास्तव में सफलता के नहीं बल्कि जीवन के आध्यात्मिक नियम हैं।उनका कहना है कि जब व्यक्ति को अपने जीवन में ईश्‍वरत्व की अद्भुत अभिव्यक्ति का अनुभव होने लगता है तभी सफलता का सही अर्थ समझ में आता है। पुस्तक के अंत में वह पाठक से तीन वचन देने की बात कहते हैं। 

ये तीनों ही वचन आध्यात्मिक दृष्टिबोध से ओतपोत हैं। वे पहले वचन के बारे में कहते हैं -अहंकार को छोड़ कर अपने आध्यात्मिक प्रयासों से अपनी श्रेष्ठता को खोजने का वचन। दूसरा- व्यक्ति अपने भीतर प्रवेश करके अपनी असाधारण योग्यता का आविष्कार करने का वचन और तीसरा तथा सबसे महत्वपूर्ण यह कि व्यक्ति मानवता के कल्याण के लिए कैसे सहायक हो सकता है, इस प्रश्‍न का स्वयं उत्तर खोज कर व्यक्ति जब अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं के साथ तालमेल बैठा कर दूसरों की सेवा और सहायता के लिए स्वयं प्रेरित होता है तो यह अध्यात्म की परिणति है।

अध्यात्म का अर्थ है अपने स्वयं के अंदर देवत्व की खोज और दूसरे को देवता मान कर उसकी सेवा और अर्चना करना।

स्वास्थ्य क्या है ? 

स्वास्थ्य की सटीक परिभाषा आयुर्वेद में प्राप्त होती है। वहां कहा गया है: समदोष: समाग्निश्च समधातु मल क्रिय:। प्रसन्नात्येन्दिय मन: स्वस्थ इत्यभिधीयते।। 

अर्थात् वह व्यक्ति स्वस्थ है जिसके तीनों दोष- वात, पित्त, कफ ठीक प्रकार से कार्य कर रहे हों। इसके साथ-साथ उसकी अग्नियां सम हों। अग्नियां 13 प्रकार की होती हैं: सात धात्वाग्नि, पांच भूताग्नि और एक जठराग्नि। भूख ठीक लगती हो और भोजन का पाचन अच्छा होता हो। सातों धातुओं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र) का निर्माण ठीक हो रहा हो। मल, मूत्र, पसीना आदि सही प्रकार से बाहर निकल रहे हो।

 अर्थात् शरीर में किसी प्रकार का रोग अथवा असंतुलन न हो। साथ ही, व्यक्ति की सभी इन्दियां (पाँचों ज्ञानेन्दियां व पांचों कर्मेन्द्रियां), मन व आत्मा प्रसन्न हों, तो ऐसे व्यक्ति को स्वस्थ कहा जाता है।

अत: स्वास्थ्य का अर्थ केवल शारीरिक या मानसिक आरोग्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक आरोग्य भी है। इस संबंध में यह भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति जितना अंतर्मुखी होगा, उतना ही ज्यादा स्वस्थ होगा। 

आज के भौतिक सुख सुविधा तकनीकी संपन्नता के सूचना प्रौद्योगिकी संचार संजाल परिवेश के हिसाब से मनुष्य ज्यादा बहिर्मुखी होता जा रहा है। इस कारण अधिकतर लोग अस्वस्थ हो रहे। 

वस्तुतः शरीर के रोगों का नाश करने की शक्ति हमारे अंदर ही है। बस उसे कुछ क्रियाओं के द्वारा बढ़ाना और पहचानना होता है। ऐसा करने से व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। अंदर की शक्तियों का जागरण आध्यात्मिक जागृति से संभव है।

आज चिकित्सा के क्षेत्र में पहले के मुकाबले बेहतर सुविधाएं, दवा और उपकरण उपलब्ध हैं, फिर भी रोगों पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? यह सही है कि पहले की अपेक्षा आज चिकित्सा के क्षेत्र में नए-नए शोध हो रहे हैं, रोगों पर काबू नहीं होने और नए घातक रोगों के सिर उठाने का कारण यह है कि हम अपने आंतरिक स्वरूप के साथ नहीं जुड़ पा रहे हैं।

जब तक हम अध्यात्म की दिशा में आगे नहीं बढ़ेंगे, तब तक रोग के घेरे में रहेंगे। इसलिए आज आध्यात्मिक स्वास्थ्य की अत्यधिक जरूरत है। अगर आध्यात्मिक स्वास्थ्य हासिल हो जाए, तो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य आसानी से प्राप्त हो जाता है।

आध्यात्मिक स्वास्थ्य से क्या तात्पर्य है? 

सनातन धर्म दृष्टि से देखें तो अपने स्वरूप में स्थित हो जाना ही आध्यात्मिक स्वास्थ्य है। यह बहुत उच्च स्थिति है। अपने स्वरूप में स्थित होना सरल बात नहीं है। इसके लिए पहले अपने स्वरूप को पहचानना होगा और उसका अनुभव करना होगा। अपने भीतर से जुड़ना होगा। 

आज सामान्यतया व्यक्ति परिवार से, धन-दौलत से, जमीन-जायदाद से, रिश्ते-नातों से ओपचारिक रूप से जुड़ता है। गहराई में देखा जाए तो वह अपने से बाहर दिखाई देने वाले शरीर से जुड़ता है। यह जुड़ना वास्तविक जुड़ना नहीं है, क्योंकि यह सब तो एक दिन छूट ही जाना है। 

स्वयं के असली स्वरूप को पहचानने के लिए बाहर का सब कुछ जाना हुआ, याद किया हुआ, पाया हुआ, बाहर ही छोड़कर शांत भाव से स्थिर हो जाना होता है। जब तक बाहर का छूटेगा नहीं, तब तक भीतर का दिव्य आत्मदर्शन मिलेगा नहीं। यह स्थिति निर्विचार की अवस्था है। इसे ध्यान की अवस्था भी कहा गया है। यह स्थिति आध्यात्मिक स्वास्थ्य की अवस्था है।

आध्यात्मिक स्वास्थ्य उपलब्धि की इस अवस्था में दृष्टा अपने ही स्वरूप में स्थित हो जाता है। जब साधक एक बार अपने स्वरूप का दर्शन कर लेता है, तब उसके भीतरी मन के मलों का नाश होने लगता है।

अनुकूलता स्थापित हो जाती है जैसे कि काम, क्रोध, लोभ और मोह उसे सताते नहीं हैं। चिंता, चिंतन में बदल जाती है। तनाव, शांति में। सुख-दुख, आनन्द में। निराशा, प्रसन्नता में। घृणा, प्रेम में तब्दील हो जाता है। हिंसा, करुणा में। झूठ, सत्य में। कामवासना, ब्रह्मचर्य में। चोरी का भाव अस्तेय में। इच्छाएं संतुष्टि में। वाणी का तीखापन कोमलता में। आहार मिताहार हो जाता है। सबके साथ मित्रता व प्रेम का भाव आ जाता है, फिर न कोई शोक होता है, न रोग होता है। अवगुणों, मलिनताओं, दुखों का स्वत: ही नाश होने लगता है। 

आध्यात्मिक स्वास्थय द्वारा आरोग्य प्राप्त ऐसे व्यक्ति के लिए फिर भी कुछ अशुभ नहीं होता, क्योंकि वह आत्मदर्शन कर चुका होता है। शरीर को स्वस्थ रखने का उसका थोड़ा प्रयास भी सार्थक सिद्ध होता है। ऐसे में योग की साधना पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करने वाली सिद्ध होती है।

अतः हम किसी भी धर्म के मानने वाले हों और ईश्वर के किसी भी स्वरुप पर आस्था रखते हों, इन सबके मूल में निहित अध्यात्म हमें स्वस्थ रहने की प्रेरणा देता है ।

 सदियों पूर्व आयुर्वेद के मनीषी सुश्रुत ने स्वास्थ्य को परिभाषित करते समय "सम दोषः समअग्निः समधातु: मल: क्रियाः प्रसन्नआत्मइन्द्रियः मनः स्वस्थमितिधीयते ! कहकर स्पष्ट की थी ।

वर्तमान के कुछ शोध से यह बात और अधिक पुख्ता साबित हुई है कि व्यक्ति की धार्मिक आस्था और विश्वास उसकी पर्सनालिटी के लिए जिम्मेदार होता है ।

वैज्ञानिक डान कोहेन, एसिस्टेंट प्रोफ़ेसर,रेलीजीयस स्टडीज, यूनिवर्सीटी आफ मिसौरी के अनुसार आध्यात्मिक चेतना विकसित होने पर व्यक्ति स्वयं ( मैं) के भाव से दूर होता हुआ विस्तृत एकात्म चिंतन अर्थात ब्रह्माण्ड से अपने जुड़ाव (एकात्मकता ) को महसूस करने लगता है ।

वर्तमान शोध के परिणामों में यह बात साफ़ देखी गयी कि इन सभी धर्मावलम्बियों में पायी गयी प्रचुर आध्यात्मिक चेतना उनके अच्छे मानसिक स्वास्थ्य से सीधे समबंधित थी । इससे पूर्व के कई शोध में भी यह पाया गया था कि सकारात्मक आध्यात्मिक चेतना व्यक्ति को विभिन्न घातक अवस्थाओं जैसे: कैंसर,रीढ़ की हड्डी की चोट या दिमागी चोट से उबरने में काफी मददगार होती है .. 

अतःसनातन धर्म संस्कृति में आस्था और विश्वास का मूल इसके अन्दर निहित आध्यात्म है जो हमें मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करने के साथ-साथ गंभीर परिस्थितियों को सरलता से जूझने में मददगार होता है साथ ही व्यक्ति आध्यात्मिक स्वास्थ्य उपलब्धि अर्जित करके अपने जीवन में सर्वांगीण प्रगति प्राप्त करके आत्म उत्कर्ष की ओर अग्रसर होता है।

🔸संपर्क🔸

 डा सुरेंद्र सिंह विरहे

उप निदेशक

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी संस्कृति परिषद् भोपाल

शोध समन्वयक

आध्यात्मिक नैतिक मूल्य शिक्षा शोध

धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग मध्य प्रदेश शासन

 मनोदैहिक आरोग्य आध्यात्मिक स्वास्थ्य विषेशज्ञ एवं लाईफ कोच, स्प्रिचुअल योगा थेरेपिस्ट


स्थापना सदस्य

मध्य प्रदेश मैंटल हैल्थ एलाइंस चोइथराम हॉस्पिटल नर्सिंग कॉलेज इंदौर


निदेशक

दिव्य जीवन समाधान उत्कर्ष

Divine Life Solutions Utkarsh


पूर्व अध्येता

भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद् दिल्ली


"Philosophy of Mind And Consciousness Studies"


Ex. Research Scholar

At: Indian Council of Philosophical Research ICPR

Delhi


utkarshfrom1998@gmail.com


9826042177,

8989832149


Monday, November 21, 2022

पति पत्नी के रिश्ते को अच्छे से निभाने के लिए क्या करें !

 पति पत्नी का रिश्ता दुनिया में सबसे ज्यादा चुनौती पूर्ण और अनमोल है। पति पत्नी के रिश्ते की खुबसूरती है आपसी तालमेल, विश्वास,परवाह,समन्वय, निस्वार्थ सेवा भाव और अटूट प्रेम । यह एक ऐसा आपसी मधुर संबंध है जिसमें एक दूसरे को हर पल आश्वस्त करना सहयोग सुरक्षा संरक्षण प्रदान करना व निष्ठा के साथ सतत निभाने की सुनिश्चितता प्रदान करना अत्यंत आवश्यक होता है।

आजकल की भागम भाग भरी जिंदगी में आपसी संबंधों में टूटन दरार, बिखराव और तनाव बढ़ता जा रहा है ऐसे में अगर पति पत्नी के रिश्ते में भी खटास आ जाए तो यह अत्यंत चिंताजनक स्थिति की ओर इशारा करता है क्योंकि इसका सीधा बुरा असर आपके परिवार बच्चों पर पड़ता है। दुनिया में सबसे ज्यादा कीमती अगर कुछ है तो वह है अपनों की अपने परिवार की खुशी। इसे कायम रखने के लिए हर संभव कोशिश की जानी चाहिए।

पति पत्नी का रिश्ता दुनिया में सबसे ज्यादा सुखद रोमांचक और अनूठा होता है जीवन की बड़ी से बड़ी चुनौतियों को कठिनाइयों को दूर करने में यह रिश्ता प्रेरणा व हौंसला प्रदान करने वाला होता है। इंसान की सफलता और उपलब्धियों के पीछे दांपत्य जीवन की अनुकूलता अत्यंत जरूरी है । 

विवाह संबंध निर्वहन में इस अनमोल रिश्ते को निभानें में पति पत्नी की बराबर की भूमिका दांपत्य जीवन पारिवारिक सुख सुविधा जुटान ,प्रबंधन करने की कला में दोनों का निपुण होना अत्यंत आवश्यक होता है।

पत्नी अपनी ग्रह कार्य , साज सज्जा, सफाई पाक कला और सजने संवरने , सौंदर्यवान बनने की कुशलता दक्षता के साथ पति को सेवा सुविधा एवं समर्पण भाव से प्रेम प्रदान करती है।

इसी तरह से पति अपने कर्तव्य निर्वहन के साथ पत्नी को रोटी कपड़ा मकान, भरण पोषण , संरक्षण सेवा ,सुख सुविधा और आजीवन अनेकों भेंट देने के साथ भरपूर प्रेम आनंद प्रदान करने की व्यवस्था करता है।


उपरोक्त समझोते संदर्भ के साथ परस्पर विवाह संस्कार के वचनों को निभाते हुए पति पत्नी अपने रिश्ते को अच्छे से कायम रख सकते हैं।


इसके अलावा पति पत्नी के रिश्ते को अच्छा रखने के लिए एक दूसरे के स्वभाव आदत, पसंद ना पसंद को ध्यान में रखते हुए हर पल हर दिन सुख भोग आनंद प्रदान करने की नित नई आश्चर्य चकित करने लुभाने, रिझाने, बच्चों की तरह लड़ने झगड़ने एक दूसरे को रूठने मनाने बहलाने की चेष्ठा प्रवृत्ति को कायम रखना अत्यंत आवश्यक होता है

और साथ ही एक दूसरे की शक्ति खूबी विशेषता को जान कर प्रोतसाहित प्रेरित करना व गलतियो ,कमजोरियों को सुधारने में सहयोग प्रदान करना जरूरी होता है कभी कभी एक दूसरे के अनजाने में हुए गलत बुरे आचरण बर्ताव को नजरंदाज कर फिर से नई शुरआत करने का सिलसिला जारी रखना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।इसके अतिरिक्त आप स्वयं जो जरूरी समझते हैं उसे कमेंट में लिखकर भेंजे।

🔸संपर्क🔸

*डा सुरेंद्र सिंह विरहे

उप निदेशक

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी संस्कृति परिषद् संस्कृति विभाग एवं

शोध समन्वयक

आध्यात्मिक, नैतिक मूल्य शिक्षा शोध

धार्मिक न्यास धर्मस्व विभाग मध्य प्रदेश शासन भोपाल*

*मनोदैहिक आरोग्य आध्यात्मिक स्वास्थ्य विषेशज्ञ एवं लाईफ कोच, स्प्रिचुअल योगा थेरेपिस्ट*


*स्थापना सदस्य

मध्य प्रदेश मैंटल हैल्थ एलाइंस चोइथराम हॉस्पिटल नर्सिंग कॉलेज इंदौर*


*निदेशक

दिव्य जीवन समाधान उत्कर्ष

Divine Life Solutions Utkarsh*


*पूर्व अध्येता

भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद् दिल्ली


"Philosophy of Mind And Consciousness Studies"


JRF At: Indian Council of Philosophical Research ICPR

Delhi*


utkarshfrom1998@gmail.com


9826042177,

8989832149




Saturday, November 19, 2022

स्त्री के अस्तित्व पर अमानवीय कृत्य की शर्मनाक घटना बलात्कार

स्त्री के अस्तित्व पर अमानवीय कृत्य की शर्मनाक घटना बलात्कार भारत में भयावह रूप लेती जा रही है।

महिलाओं बच्चियों एवम युवतियों का मानसिक स्वास्थ्य बलात्कार की पीढ़ा सहन करने से पूरी तरह बिगड़ जाता है। 

यौन हिंसा का प्रभाव पूरी तरह से विनाशकारी हो सकता है, जो केवल शारीरिक आघात तक ही सीमित नहीं है बल्कि भावनात्मक संकट तक भी फैलता है। हमले से उत्पन्न भावनात्मक दर्द इतना कष्टदायी होता है कि यह पीड़ित को बेड़ियों में जकड़ देता है, जिससे वह चिंतित, भयभीत, लज्जित और यहां तक ​​कि फ्लैशबैक, कष्टप्रद यादों और बुरे सपने से भी पीड़ित हो जाती है।

अक्सर बलात्कार से बचे लोग मनोवैज्ञानिक निशान (सायकोलॉजिकल मार्क) झेलते हैं और मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों से लगातार निपटते हैं जिनमें अवसाद (डिप्रेशन), चिंता, अभिघातजन्य तनाव विकार (पोस्ट ट्रॉमेटीक स्ट्रेस डिसऑर्डर) (जिसे पीटीएसडी भी कहा जाता है), मादक द्रव्यों (नारकोटिक) के सेवन के वजह से विकार, शराब, नशीली दवाओं की लत, क्रोनिक फेटिग, सामाजिक वापसी, नींद विकार (स्लीपिंग डिसऑर्डर), एनोरेक्सिया बुलिमिया, और सीमा रेखा व्यक्तित्व विकार (बॉर्डर लाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर) शामिल हैं। 

समाज में लव जेहाद के लगातार बढ़ते मामलों चिंताजनक है । युवती किशोर अवस्था की बच्चियों की हत्या कर दी जाती है।यह सब षड्यंत्र के रूप में सामने आ रहे हैं।

इस तरह के यौन हमलों के कारण होने वाला आघात गंभीर होता है और इसके बाद अक्सर असहायता, अपराधबोध (गिल्ट), आत्म-दोष (सेल्फ ब्लेम) की भावनाएँ आती हैं। कई मामलों में पीड़ित घटी हुई घटना से इतने घबरा जाते हैं कि वे आईने से बचने लगते हैं।

आज हमारे समाज की सबसे दर्दनाक सच्चाई यह है कि पीड़ित को अपमानित किया जाता है और उसकी अवहेलना (डिसरिगार्ड) की जाती है और अक्सर उसे दोषी ठहराया जाता है। संरचित प्रणाली (स्ट्रक्चर्ड सिस्टम) हमेशा उत्तरजीवियों (सर्वाइवर्स) को मानसिक शांति प्रदान करने में विफल रहती है।

बलात्कार लव जेहाद के इन मामलों में सरकार को गंभीरता से लेते हुए कड़े कानून सजा का प्रावधान करना होगा अन्यथा समाज में अराजकता फैल जाएगी सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ जाने के खतरें है।

माता पिता अभिभावक अपने बच्चों को संस्कार देकर सदैव सतर्क व जागरूक करें एवम चारित्रिक विकास पारिवारिक जीवन में आपसी विश्वास परवरिश में कभी कोई कमी न रखें।

सनातन धर्म संस्कृति को युवा पीढ़ी आत्मसात कर अपने जीवन में अध्यात्म को अंगीकार करें।

योग ध्यान प्राणायाम के नियमित अभ्यास द्वारा बलात्कार पीड़ित को संवेदनात्मक भावात्मक रूप से उस दुखद घातक घटना से उबरने में मदद करें।लगातार संवाद करके आत्म विश्वास कायम कराने में सहानुभूति बनाए रखें।


मनोयोग माइंड पावर

 अक्सर लोग मुझे पूछते हैं कि - "मैं जानता हूँ कि गुस्सा करना गलत है… फिर भी मुझसे हो जाता है। मैं जानता हूँ कि यह रिश्ता मुझे तोड़ रहा ...