Tuesday, November 29, 2022

सनातन धर्म हिंदू भारतीय संस्कृति आध्यात्म की प्रेरक मानवतावादी संस्कृति है!

 सनातन धर्म संस्कृति में आध्यात्मिक उत्कर्ष की अवधारणा: 


सनातन धर्म हिंदू भारतीय संस्कृति आध्यात्म की प्रेरक मानवतावादी संस्कृति है।

 ‘‘अध्यात्म का गंतत्य एवं मंतत्य है, शुद्ध चेतना में अवगाहन तथा सत्य का साक्षात्कार।’’ शुद्ध चेतना में अवगाहन का उद्देश्य है अपने ‘स्व’ में प्रतिष्ठित होना, तभी तो प्राचीन ऋषि कहता है ‘आत्मान विद्धि’ स्वयं को जानो।


 यह स्वयंं को जानना, जीवन के मूल सत्व में, स्नोत में प्रतिष्ठित होना है । स्वयं के साथ मित्रता करके सत्य का साक्षात्कार किया जा सकता है।


सनातन हिंदू धर्म के जितने भी धार्मिक ग्रंथ हैं, उन सभी के मूल में व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्कर्ष की कामना ही है,


 चाहे वह श्रीमद् भागवत हो, या रामायण हो या फिर महाभारत का विशाल ग्रंथ ही क्यों न हो। इन ग्रंथों में जितने भी कथानक हैं, उन सभी का अंतिम संदेश यही है कि मानव स्वयं को जाने और फिर जैसा स्वयं के प्रति दूसरों से व्यवहार की कामना करता है, वैसा ही व्यवहार वह दूसरों से करें । यही आध्यात्मिक दृष्टि है ।


 मानव का प्रकृति और सृष्टि के साथ तादात्म्य तथा उसके साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार ही अध्यात्म का अभीष्ट है। इसी दिशा में वैदिक ऋषि का आहवान है-


मित्रस्त्र मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीशन्ताम


मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे


सम्पूर्ण प्राणीमात्र मुझ से मित्र भाव रखें, तथापि मेरा भी यही कर्तव्य है कि मैं भी सम्पूर्ण सृष्टि तथा प्रकृति के प्रति मित्रता का भाव रखूं| यह भाव सदैव व्यक्ति के चरित्र और व्यवहार में बना रहें, यही आध्यात्म है इसी भाव को हमारे सभी धर्म ग्रंथों में बड़े ही अच्छे ढंग से विभिन्न आख्यानों और कथाओं के माध्यम से समझाने का प्रयत्न किया गया है, जिससे आध्यात्मिक विकार और ताप का शमन हो और चित्त निष्कपट, सरल और विशुद्ध होकर सबके कल्याण के लिए प्रवृत्त हो, यही धर्म है। 


श्रीमद् भागवत में महर्षि वेदव्यास ने यही बात कही है-


धर्म:- प्रोज्झितकतवो त्र परमो निर्मत्सराणां सताम


इसी आध्यात्मिक भाव को कठोपनिषद के ऋषि ने कहा है कि जो व्यक्ति शरीर, मन और बुद्धि से अपने अस्तित्व को जान लेता है और अपने स्व में प्रतिष्ठित हो जाता है तो उसे विशुद्ध आत्मानंद की अनुभूति होती है और वह आनंद शाश्‍वत होता है-


एक वशी सर्वमूतान्तरात्मा, एक रुप बहुदा य : करोति


तमात्म स्थं ये नुपश्यन्ति घारी:, तेषा सुख शाश्‍वंत नेत रेषाम


मानव के के अंत:करण की सभी प्रवृतियां निरंतर साधना एवं अभ्यास से जब विराट के साथ एकाकार होने के लिए प्रयत्न करती हैं, उससे प्रसूत आनंद ही अध्यात्म है।


भारतीय जीवन शैली अपने शुद्ध रूप में आध्यात्मिक ही है। उसका प्रत्येक तत्व व पहलू अध्यात्म से भाविक है और सृजित है और उसका लक्ष्य एक ही है सत्य का साक्षात्कार और स्वयं में सत्य का अविष्कार जिसको महापुरुषों ने विद्वानों ने, अपनी-अपनी दृष्टि से परिभाषित किया है और जानने की कोशिश भी की है।


भारतीय वैदिक वाङ्मय तथा संस्कृति इस सनातन आध्यात्मिक चेतना को एक नए दृष्टिबोध के साथ उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी भारत के राष्ट्र निर्माताओं और दार्शनिकों जिनमें स्वामी विवेकानंद, योगी श्री अरविंद, महात्मा गांधीजी, विनोबा भावे आदि प्रमुख हैं, ने प्रस्तुत किया। यह नवजागरण का मानवीय अध्यात्म था।


बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ का अध्यात्म दीप स्वामी विवेकानंद ने प्रकट किया था, जिसका प्रकाश अमेरिका तथा अन्य युरोपीय देशों तक पहुंचा था। स्वामी विवेकानंद जी ने वेदांत के तत्व को एक नई दृष्टि दी, जिससे केवल भारत ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्‍व आलोकित हो गया। स्वामी विवेकानंद ने तत्कालीन समाज में पीड़ित मानवता की सेवा में अपने अध्यात्म की खोज की। 


भारत की आध्यात्मिक परंपरा को उन्होंने ‘‘सेवा ही परमो धर्मः’’ में साकार किया । श्रीमद् भागवत के तृतीय स्कंध में कपिल मुनि द्वारा आध्यात्मिक सूत्र को देश के सामने रखा। 


कपिल मुनि द्वारा अपनी माता को जो आध्यात्मिक उपदेश दिया गया था, उसका मूल संदेश है कि परमात्मा प्रकृति के कण-कण में और सभी प्राणियों में विद्यमान है, यदि लोग प्राणिमात्र की सेवा बजाय केवल प्रतिमा में स्थूल पूजा- अर्चना करते हैं तो ऐसी उपासना केवल खोखला प्रदर्शन और दिखावा है।


अंह सर्व भूतषु भूतात्मावस्थित: सदा


तमवज्ञा मां मर्त्य: कुरुते र्चा विडाम्बनम


स्वामीजी ने भी राष्ट्र के सभी नवयुवकों का आह्वान करते हुए कहा था कि गरीबों, दलितों और वंचितों की सेवा करना ही परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ उपासना है। उन्होंने कहा, ‘‘मेरा बार-बार जन्म हो तथा मैं हजारों दु:खों को सहूं ताकि मैं उस एकमात्र परमात्मा की उपासना कर सकूं जिसका अस्तित्व है, वह एकमात्र जिसमें मुझे विश्‍वास है - सभी आत्माओं का सम्मिलित रूप और इनसे भी परे मेरा परमात्मा जो मूर्त में है, मेरा परमात्मा जो पीड़ितों में है, मेरा परमात्मा जो सभी जातियों, सभी नस्लों के निर्धनों में है- वही मेरी पूजा का विषय है।’’


भारतीय सनातन विचार दर्शन में जो बातें कहीं गई हैं, उसका सीधा सम्बंध अंतर्मन से है । इस दर्शन की धारणा है कि व्यक्ति अपने भीतरी मनोभावों से ही बाहर की प्रकृति और समाज के प्रति अपने व्यवहार और विचारों को कार्य रूप में परिणित करता है। ये विचार और व्यवहार ही जब लम्बे समय तक चलते हैं और लोगों द्वारा अपनाए जाने लगते हैं, तो वे ही जीवन मूल्य कहलाते हैं; क्योंकि वे मनुष्य की भीतरी आध्यात्मिक प्रकृति से उत्पन्न होते हैं।


अतएव विवेकानंद द्वारा सेवा को सर्वोपरि मानकर समाज के पुन: जागरण का आह्वान वास्तव में अध्यात्म से प्रसूत आंदोलन ही था।


श्रीमद् भागवत में कपिल मुनि द्वारा दूसरी महत्वपूर्ण जो बात कही गई, उसको स्वामीजी ने अपने कार्यों और आचरण से एक उदाहरण के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत किया और कहा कि भारत की उन्नति, प्रगति तथा उत्कर्ष के मूल में सेवा की सबसे प्रमुख भूमिका होगी।


कपिल मुनि के माध्यम से परमात्मा कहते हैं-


अथ मां र्वभूतेषु भूतात्मानं कृतालयम


अर्हयेद्यापमानमानाभ्यां मैत्र्या भिन्नेन चक्षुषा॥


अर्थात सभी प्राणियों में मेरी पूजा अर्चना करो, क्योंकि मैं सब में एकमेव आत्मा हूं और मैंने उनकी देह को अपना मंदिर बना लिया है, इसलिए मेरी पूजा करो, और यह पूजा दान के द्वारा लोगों के अभावों को, दु:खों को, अशिक्षा को दूर करके करिए, किंतु यह कार्य उनका आदर करते हूए करना चाहिए।


इसी सनातन आध्यात्मिक संदेश को स्वामी विवेकानंद ने अपने पुनर्जागरण का मुख्य उद्देश्य घोषित किया और राष्ट्र के नवयुवकों को मानवता की सेवा के लिए पूरी निष्ठा से जुट जाने को कहा।


 सनातन हिन्दू धर्म के मूल तत्व सेवा को पुन: प्रतिष्ठित करने का आवाहन करते हुए कहा, ‘‘मानव देह मंदिर में प्रतिष्ठित मानव आत्मा ही एकमात्र पुत्रार्थ भगवान है। अवश्य समस्त प्रणियों की देह भी मंदिर है, पर मानव देह सर्वश्रेष्ठ है, वह मंदिरों में सर्वश्रेष्ठ है। यदि मैं उसमें भगवान की पूजा न कर संकू, तो और कोई भी मंदिर किसी काम का न होगा।’’


अध्यात्म के इस सेवा तत्व को योगी अरविंद, महात्मा गांधी तथा विनोबा भावे ने सबसे प्रमुख माना। आचार्य विनोबा भावे के अनुसार ‘‘सत्य, संयम और सेवा के इन तीन सूत्रों में पारमार्थिक जीवन का अध्यात्म अंकुरित और पल्लवित होता है।


 श्रीमद् भगवतगीता, जो अध्यात्म तत्व का वैश्‍विक ग्रंथ है, उसके बारहवें अध्याय में श्री कृष्ण ने इसका बड़ा सुंदर विवेचन किया है। कृष्ण कहते हैं-


संनियम्यान्द्रिय ग्रामं सर्वत्र समबुद्धय:।


ते प्राप्तुवन्ति मामेव सर्वभूत हिते रता:|


जो व्यक्ति अपने इंद्रियों पर संयम रख कर जीवनयापन करते हैं औरसभी के प्रति समान दृष्टि रखते हैं, साथ ही प्राणीमात्र के कल्याण और सेवा में लोग रहते हैं, वे अंततोगत्वा मुझे ही अर्थात परमात्मा को प्राप्त होते हैं।


 आज जब इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक के उत्तरार्ध में मानव विज्ञान, टेक्नालाजी के उत्कर्ष के कारण समस्त सुविधाओं और संसाधनों से परिपूर्ण जीवन जी रहा है, ऐसे समय में भी मानवता को आतंक, अत्याचार, हिंसा, आक्रोश से छुटकारा नहीं मिल रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था में सभी प्रकार की सुख सुविधाओं और विपुल उपग्रह पर केवल कुछ मुट्ठीभर लोग ही भौतिक सुख का लाभ उठा पा रहे हैं, दूसरी ओर करोड़ों लोग शारीरिक कुपोषण, रोग और अन्नान्य व्याधियों से ग्रस्त हैं।


किंतु जो लोग भौतिक सुख संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं, वे आध्यात्मिक कुपोषण से ग्रस्त है और यही कारण है कि सारा विश्‍व बारूद के ढेर पर बैठा है।


 जिस प्रकार से विश्‍व में आतंकवाद ने पैर पसारा है और स्थान-स्थान पर हिंसा का ताडंव हो रहा है, उससे यह निश्‍चित संकेत मिल रहे हैं कि यदि इन खतरों से बचने के लिए कोई सुनिश्‍चित प्रयत्न नहीं किए गए तो विनाश सुनिश्‍चित है। 


कई वर्ष पहले बटेर्रण्ड रसेल ने इस बात को जान लिया था, यद्यपि वे अनीश्‍वरवादी थे, आध्यात्मिकता में बहुत विश्‍वास नहीं था, फिर भी उन्होंने अध्यात्म और जीवन मूल्यों के महत्व को समझा था और कहा था‘‘जीवन मूल्य कोई यांत्रिक वस्तु नहीं है, मशीन शैतान का आधुनिक रूप है और इसकी पूजा अर्थात पैशाचिकता - चाहे प्रत्येक वस्तु मशीनी हो जाए किंतु जीवन मूल्य यांत्रिक या मशीनी नहीं हो सकते और यह एक ऐसी बात है जो किसी को भी नहीं भूलनी चाहिए|’’


सम्पूर्ण विश्‍व में आध्यात्मिक आंदोलन को चलाने की आवश्यकता और उसमें भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वामी विवेकानंद ने आज से कई वर्ष पहले अनुभव कर लिया था, तभी उन्होंने उस समय कहा था, ‘‘मेरे राष्ट्र का प्रमुख तत्व है यह लोकातीतवाद अर्थात अध्यात्म, पार जाने का यह संघर्ष, प्रकृति के मुखौटे को उतार देने का यह साहस और किसी भी कोमल तथा किसी भी प्रकार के खतरे को उठा कर उस पार की झलक पा लेना-क्या तुम इस भाव को प्रोत्साहित करना चाहते हो। ऐसा करने का एक ही रास्ता है कि राजनीति और सामाजिक पुननिर्माण के बारे तुम्हारे भाषण और पैसा कमाने के ढंग के बजाए तुम्हें संसार को आध्यात्मिक ज्ञान देना है।


 वेदांत की विचारधाराओं का प्रचार करना होगा, इन्हें न केवल जंगल और गुफाओं में वरन वकीलों और न्यायाधीशों, मंदिरों, गरीब की कुटिया, मछली पकड़ने वाले मछुआरों और विद्यार्थियों तक इस संदेश को पहुंचना होगा।’’


आधुनिक युग के कई पश्‍चिमी विचारकों ने भी अध्यात्म के इस अवदान के लिए भारत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है।


प्रसिद्ध अमेरिकी इतिहासकार बिल ड्यूटेंट ने अपने ग्रंथ ‘स्टोरी आफ सिविलाइजेशन’ के पहले खण्ड में ‘अवर ओरियंटल हेरिटेज’ शीर्षक में बताया कि ‘भारत हमें परिपक्व बुद्धि, सहनशीलता और शालीनता, अपरिग्रह, संतोष, शांति तथा सभी प्राणियों एवं प्रकृति के प्रति एकता और प्रेम की शिक्षा देने का सामर्य्थ रखता है।’ यही अध्यात्म है, जिसकी परिणति सेवा में होती है।


मानव जीवन में आध्यात्मिक दृष्टिबोध की आवश्यकता को आज बड़ी ही गहनता से अनुभव किया जा रहा है। सभी प्रकार की सुख सुविधाओं तथा संसाधनों के बावजूद जीवन में जो रिक्तता और खालीपन पैदा हो रहा है, उससे सामाजिक और वैयक्तिक जीवन बिखर रहा है।


जीवन को सफलता तथा शांति के साथ जीने के लिए विश्‍व प्रसिद्ध आध्यात्मिक विचारक दीपक चोपड़ा की एक बहुत प्रसिद्ध पुस्तक है, जिसका नाम है ‘दि सेवन स्प्रिचुअल लॉज ऑफ सक्सेस’ अर्थात सफलता के सात आध्यात्मिक नियम। उसकी भूमिका में वे लिखते हैं कि यह वास्तव में सफलता के नहीं बल्कि जीवन के आध्यात्मिक नियम हैं।उनका कहना है कि जब व्यक्ति को अपने जीवन में ईश्‍वरत्व की अद्भुत अभिव्यक्ति का अनुभव होने लगताहै तभी सफलता का सही अर्थ समझ में आता है। पुस्तक के अंत में वह पाठक से तीन वचन देने की बात कहते हैं। 


ये तीनों ही वचन आध्यात्मिक दृष्टिबोध से ओतपोत हैं। वे पहले वचन के बारे में कहते हैं -अहंकार को छोड़ कर अपने आध्यात्मिक प्रयासों से अपनी श्रेष्ठता को खोजने का वचन। दूसरा- व्यक्ति अपने भीतर प्रवेश करके अपनी असाधारण योग्यता का आविष्कार करने का वचन और तीसरा तथा सबसे महत्वपूर्ण यह कि व्यक्ति मानवता के कल्याण के लिए कैसे सहायक हो सकता है, इस प्रश्‍न का स्वयं उत्तर खोज कर व्यक्ति जब अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं के साथ तालमेल बैठा कर दूसरों की सेवा और सहायता के लिए स्वयं प्रेरित होता है तो यह अध्यात्म की परिणति है।


अध्यात्म का अर्थ है अपने स्वयं के अंदर देवत्व की खोज और दूसरे को देवता मान कर उसकी सेवा और अर्चना करना।


स्वास्थ्य क्या है ? 


स्वास्थ्य की सटीक परिभाषा आयुर्वेद में प्राप्त होती है। वहां कहा गया है: समदोष: समाग्निश्च समधातु मल क्रिय:। प्रसन्नात्येन्दिय मन: स्वस्थ इत्यभिधीयते।। 


अर्थात् वह व्यक्ति स्वस्थ है जिसके तीनों दोष- वात, पित्त, कफ ठीक प्रकार से कार्य कर रहे हों। इसके साथ-साथ उसकी अग्नियां सम हों। अग्नियां 13 प्रकार की होती हैं: सात धात्वाग्नि, पांच भूताग्नि और एक जठराग्नि। भूख ठीक लगती हो और भोजन का पाचन अच्छा होता हो। सातों धातुओं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र) का निर्माण ठीक हो रहा हो। मल, मूत्र, पसीना आदि सही प्रकार से बाहर निकल रहे हो।


 अर्थात् शरीर में किसी प्रकार का रोग अथवा असंतुलन न हो। साथ ही, व्यक्ति की सभी इन्दियां (पाँचों ज्ञानेन्दियां व पांचों कर्मेन्द्रियां), मन व आत्मा प्रसन्न हों, तो ऐसे व्यक्ति को स्वस्थ कहा जाता है।


अत: स्वास्थ्य का अर्थ केवल शारीरिक या मानसिक आरोग्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक आरोग्य भी है। इस संबंध में यह भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति जितना अंतर्मुखी होगा, उतना ही ज्यादा स्वस्थ होगा। 


आज के भौतिक सुख सुविधा तकनीकी संपन्नता के सूचना प्रौद्योगिकी संचार संजाल परिवेश के हिसाब से मनुष्य ज्यादा बहिर्मुखी होता जा रहा है। इस कारण अधिकतर लोग अस्वस्थ हो रहे। 


वस्तुतः शरीर के रोगों का नाश करने की शक्ति हमारे अंदर ही है। बस उसे कुछ क्रियाओं के द्वारा बढ़ाना और पहचानना होता है। ऐसा करने से व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। अंदर की शक्तियों का जागरण आध्यात्मिक जागृति से संभव है।


आज चिकित्सा के क्षेत्र में पहले के मुकाबले बेहतर सुविधाएं, दवा और उपकरण उपलब्ध हैं, फिर भी रोगों पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? यह सही है कि पहले की अपेक्षा आज चिकित्सा के क्षेत्र में नए-नए शोध हो रहे हैं, रोगों पर काबू नहीं होने और नए घातक रोगों के सिर उठाने का कारण यह है कि हम अपने आंतरिक स्वरूप के साथ नहीं जुड़ पा रहे हैं।


जब तक हम अध्यात्म की दिशा में आगे नहीं बढ़ेंगे, तब तक रोग के घेरे में रहेंगे। इसलिए आज आध्यात्मिक स्वास्थ्य की अत्यधिक जरूरत है। अगर आध्यात्मिक स्वास्थ्य हासिल हो जाए, तो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य आसानी से प्राप्त हो जाता है।


आध्यात्मिक स्वास्थ्य से क्या तात्पर्य है? 


सनातन धर्म दृष्टि से देखें तो अपने स्वरूप में स्थित हो जाना ही आध्यात्मिक स्वास्थ्य है। यह बहुत उच्च स्थिति है। अपने स्वरूप में स्थित होना सरल बात नहीं है। इसके लिए पहले अपने स्वरूप को पहचानना होगा और उसका अनुभव करना होगा। अपने भीतर से जुड़ना होगा। 


आज सामान्यतया व्यक्ति परिवार से, धन-दौलत से, जमीन-जायदाद से, रिश्ते-नातों से ओपचारिक रूप से जुड़ता है। गहराई में देखा जाए तो वह अपने से बाहर दिखाई देने वाले शरीर से जुड़ता है। यह जुड़ना वास्तविक जुड़ना नहीं है, क्योंकि यह सब तो एक दिन छूट ही जाना है। 


स्वयं के असली स्वरूप को पहचानने के लिए बाहर का सब कुछ जाना हुआ, याद किया हुआ, पाया हुआ, बाहर ही छोड़कर शांत भाव से स्थिर हो जाना होता है। जब तक बाहर का छूटेगा नहीं, तब तक भीतर का दिव्य आत्मदर्शन मिलेगा नहीं। यह स्थिति निर्विचार की अवस्था है। इसे ध्यान की अवस्था भी कहा गया है। यह स्थिति आध्यात्मिक स्वास्थ्य की अवस्था है।


आध्यात्मिक स्वास्थ्य उपलब्धि की इस अवस्था में दृष्टा अपने ही स्वरूप में स्थित हो जाता है। जब साधक एक बार अपने स्वरूप का दर्शन कर लेता है, तब उसके भीतरी मन के मलों का नाश होने लगता है।


अनुकूलता स्थापित हो जाती है जैसे कि काम, क्रोध, लोभ और मोह उसे सताते नहीं हैं। चिंता, चिंतन में बदल जाती है। तनाव, शांति में। सुख-दुख, आनन्द में। निराशा, प्रसन्नता में। घृणा, प्रेम में तब्दील हो जाता है। हिंसा, करुणा में। झूठ, सत्य में। कामवासना, ब्रह्मचर्य में। चोरी का भाव अस्तेय में। इच्छाएं संतुष्टि में। वाणी का तीखापन कोमलता में। आहार मिताहार हो जाता है। सबके साथ मित्रता व प्रेम का भाव आ जाता है, फिर न कोई शोक होता है, न रोग होता है। अवगुणों, मलिनताओं, दुखों का स्वत: ही नाश होने लगता है। 


आध्यात्मिक स्वास्थय द्वारा आरोग्य प्राप्त ऐसे व्यक्ति के लिए फिर भी कुछ अशुभ नहीं होता, क्योंकि वह आत्मदर्शन कर चुका होता है। शरीर को स्वस्थ रखने का उसका थोड़ा प्रयास भी सार्थक सिद्ध होता है। ऐसे में योग की साधना पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करने वाली सिद्ध होती है।


अतः हम किसी भी धर्म के मानने वाले हों और ईश्वर के किसी भी स्वरुप पर आस्था रखते हों, इन सबके मूल में निहित अध्यात्म हमें स्वस्थ रहने की प्रेरणा देता है ।


 सदियों पूर्व आयुर्वेद के मनीषी सुश्रुत ने स्वास्थ्य को परिभाषित करते समय "सम दोषः समअग्निः समधातु: मल: क्रियाः प्रसन्नआत्मइन्द्रियः मनः स्वस्थमितिधीयते ! कहकर स्पष्ट की थी ।


वर्तमान के कुछ शोध से यह बात और अधिक पुख्ता साबित हुई है कि व्यक्ति की धार्मिक आस्था और विश्वास उसकी पर्सनालिटी के लिए जिम्मेदार होता है ।


वैज्ञानिक डान कोहेन, एसिस्टेंट प्रोफ़ेसर,रेलीजीयस स्टडीज, यूनिवर्सीटी आफ मिसौरी के अनुसार आध्यात्मिक चेतना विकसित होने पर व्यक्ति स्वयं ( मैं) के भाव से दूर होता हुआ विस्तृत एकात्म चिंतन अर्थात ब्रह्माण्ड से अपने जुड़ाव (एकात्मकता ) को महसूस करने लगता है ।


वर्तमान शोध के परिणामों में यह बात साफ़ देखी गयी कि इन सभी धर्मावलम्बियों में पायी गयी प्रचुर आध्यात्मिक चेतना उनके अच्छे मानसिक स्वास्थ्य से सीधे समबंधित थी । इससे पूर्व के कई शोध में भी यह पाया गया था कि सकारात्मक आध्यात्मिक चेतना व्यक्ति को विभिन्न घातक अवस्थाओं जैसे: कैंसर,रीढ़ की हड्डी की चोट या दिमागी चोट से उबरने में काफी मददगार होती है .. 


अतःसनातन धर्म संस्कृति में आस्था और विश्वास का मूल इसके अन्दर निहित आध्यात्म है जो हमें मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करने के साथ-साथ गंभीर परिस्थितियों को सरलता से जूझने में मददगार होता है साथ ही व्यक्ति आध्यात्मिक स्वास्थ्य उपलब्धि अर्जित करके अपने जीवन में सर्वांगीण प्रगति प्राप्त करके आत्म उत्कर्ष की ओर अग्रसर होता है।


🔸संपर्क🔸


 डा सुरेंद्र सिंह विरहे


उप निदेशक


मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी संस्कृति परिषद् भोपाल


शोध समन्वयक


आध्यात्मिक नैतिक मूल्य शिक्षा शोध


धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग मध्य प्रदेश शासन


 मनोदैहिक आरोग्य आध्यात्मिक स्वास्थ्य विषेशज्ञ एवं लाईफ कोच, स्प्रिचुअल योगा थेरेपिस्ट

आध्यात्मिक स्वास्थ्य विज्ञान का उत्कर्ष सिद्धान्त एवं दिव्य जीवन समाधान

आध्यात्मिक स्वास्थ्य विज्ञान का उत्कर्ष सिद्धान्त एवं दिव्य जीवन समाधान ..

सनातन धर्म संस्कृति के अंतर्गत स्वास्थ्य एवं जीवनायापन की दृष्टि से आत्म-साधकों का जीवन मूलभुत रूप से प्राणी मात्र के प्रति करुणा, दया और अनुकम्पा, ‘‘सर्व जीव हिताय, सर्व जीव सुखाय’’ की लोकोक्ति को सार्थक करने का होता है। उनके कर्म योग और साधना का मूल उद्देष्य आत्मा को निर्मल, शुद्ध, पवित्र बनाना होता है। अर्थात् आत्म-पोषण का होता है।

हठ योग साधना में भले ही उन्हें कभी-कभी उसके लिए शरीर को कष्ट ही क्यों न देना पड़े? उनके जीवन में क्रोध, मान, माया, लोभरुपी कषायों की मन्दता होने से वे अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में परेशान नहीं होते। उनमें प्रायः मानसिक आवेग नहीं आते जो हमारी अन्तःस्रावी ग्रन्थियों को प्रभावित कर रोग का मुख्य कारण होते हैं। 

प्रायः ऐसे व्यक्ति सहनशील, सहिष्णु निर्भीक, और धैर्यवान होते है। वाणी में विवेक और मधुरता का सदैव ख्याल रखते हैं। उनका उद्देष्य होता है जीवन में चिरस्थायी आनन्द, शक्ति एवं स्वाधीनता की प्राप्ति। वे स्वयं के द्वारा स्वयं से अनुशासित होते हैं। उनका जीवन शान्त, सन्तोषी, संयमी, सहज, संतुलित एवं सरल होता है। विचारों में अनेकान्तता, भावों में मैत्री, करूणा, प्रमोद तथा मध्यस्थता अर्थात् सहजता, स्वदोष-दृष्टि, सजगता, सहनशीलता, सहिष्णुता, दया, सरलता, सत्य, विवेक, संयम, नैतिकता आदि गुणों का प्रादुर्भाव होता है। 

जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति के जीवन में अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में समभाव, निस्पृहता, अनासक्ति विकसित होती है। व्यक्ति निर्भय, तनाव मुक्त बन जाता है। वाणी में सत्य के प्रति निष्ठा, सभी जीवों के प्रति दया, करूणा, मैत्री, परोपकार जैसी भावना और मधुरता प्रतिध्वनित होने लगती है। व्यक्ति का मनोबल और आत्मबल विकसित होने लगता है। व्यक्ति स्वावलम्बी, स्वाधीन बनने लगता है।

आध्यात्मिक स्वास्थ्य विज्ञान का उत्कर्ष सिद्धान्त एवं दिव्य जीवन समाधान  दर्शन

भारत की सनातन हिंदू संस्कृति और जीवन पद्धति के मूल में अध्यात्म है। अध्यात्म का अर्थ है आत्मनि अधि अर्थात अपने भीतर। मानव शरीर के अंदर की जो भी भाव स्थितियां हैं वह अध्यात्म है। 

शरीर में दो प्रकार की भाव स्थितियां होती हैं - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर लेकिन उसके विपरीत गुणों के रुप में शांति, करुणा, दया, त्याग, प्रेम, सहिष्णुता सहयोग की भावना भी मानव के स्वभाव का दूसरा पहलू है।

 जब मानव काम, क्रोध, लोभ, मोह, अंहकार से ग्रस्त होकर कोई कार्य करता है तो वह आध्यात्मिक ताप होता है, जिसकी परिणति दु:ख तथा निराशा में होती है, किन्तु जब मनुष्य में करुणा, दया, त्याग की भावना जागृत होती है और उससे प्रेरित होकर जब वह कोई कार्य करता है, तो उससे जो आनंद या प्रसन्नता मिलती है, वह आध्यात्मिक सुख कहलाता है।

अतएव भारतीय चिंतकों तथा वैदिक ऋषियों ने मानव जीवन को सुखी और शांतिपूर्ण बनाए रखने के लिए दैव आध्यात्मिक स्तर पर मनुष्य की चेतना को विकसित करने का प्रयास किया है।

 यह सभी जीवन में आध्यात्मिक ताप से सदैव मुक्त रहे और आध्यात्मिक दृष्टि से अर्थात आंतरिक रुप से मनुष्य सदैव नि:श्रेयस भाव से अपने अभ्युदय के मार्ग पर चले, यही भारतीय संस्कृति और जीवन दर्शन का मूल आधार रहा है। यही कारण है कि भारतीय मनीषा में सदैव मानव आध्यात्मिक उत्कर्ष को सबसे अधिक महत्व दिया गया है।

सनातन धर्म संस्कृति में आध्यात्मिक उत्कर्ष की  अवधारणा: 

भारतीय संस्कृति आध्यात्म की संस्कृति है। ‘‘अध्यात्म का गंतत्य एवं मंतत्य है, शुद्ध चेतना में अवगाहन तथा सत्य का साक्षात्कार।’’ शुद्ध चेतना में अवगाहन का उद्देश्य है अपने ‘स्व’ में प्रतिष्ठित होना, तभी तो प्राचीन ऋषि कहता है ‘आत्मान विद्धि’ स्वयं को जानो।

 यह स्वयंं को जानना, जीवन के मूल सत्व में, स्नोत में प्रतिष्ठित होना है । स्वयं के साथ मित्रता करके सत्य का साक्षात्कार किया जा सकता है।

सनातन हिंदू धर्म के जितने भी धार्मिक ग्रंथ हैं, उन सभी के मूल में व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्कर्ष की कामना ही है,

 चाहे वह श्रीमद् भागवत हो, या रामायण हो या फिर महाभारत का विशाल ग्रंथ ही क्यों न हो। इन ग्रंथों में जितने भी कथानक हैं, उन सभी का अंतिम संदेश यही है कि मानव स्वयं को जाने और फिर जैसा स्वयं के प्रति दूसरों से व्यवहार की कामना करता है, वैसा ही व्यवहार वह दूसरों से करें । यही आध्यात्मिक दृष्टि है ।

 मानव का प्रकृति और सृष्टि के साथ तादात्म्य तथा उसके साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार ही अध्यात्म का अभीष्ट है। इसी दिशा में वैदिक ऋषि का आहवान है-

मित्रस्त्र मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीशन्ताम

मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे

सम्पूर्ण प्राणीमात्र मुझ से मित्र भाव रखें, तथापि मेरा भी यही कर्तव्य है कि मैं भी सम्पूर्ण सृष्टि तथा प्रकृति के प्रति मित्रता का भाव रखूं| यह भाव सदैव व्यक्ति के चरित्र और व्यवहार में बना रहें, यही आध्यात्म है  इसी भाव को हमारे सभी धर्म ग्रंथों में बड़े ही अच्छे ढंग से विभिन्न आख्यानों और कथाओं के माध्यम से समझाने का प्रयत्न किया गया है, जिससे आध्यात्मिक विकार और ताप का शमन हो और चित्त निष्कपट, सरल और विशुद्ध होकर सबके कल्याण के लिए प्रवृत्त हो, यही धर्म है। 

श्रीमद् भागवत में महर्षि वेदव्यास ने यही बात कही है-

धर्म:- प्रोज्झितकतवो त्र परमो निर्मत्सराणां सताम

इसी आध्यात्मिक भाव को कठोपनिषद के ऋषि ने कहा है कि जो व्यक्ति शरीर, मन और बुद्धि से अपने अस्तित्व को जान लेता है और अपने स्व में प्रतिष्ठित हो जाता है तो उसे विशुद्ध आत्मानंद की अनुभूति होती है और वह आनंद शाश्‍वत होता है-

एक वशी सर्वमूतान्तरात्मा, एक रुप बहुदा य : करोति

तमात्म स्थं ये नुपश्यन्ति घारी:, तेषा सुख शाश्‍वंत नेत रेषाम

मानव के के अंत:करण की सभी प्रवृतियां निरंतर साधना एवं अभ्यास से जब विराट के साथ एकाकार होने के लिए प्रयत्न करती हैं, उससे प्रसूत आनंद ही अध्यात्म है।

भारतीय जीवन शैली अपने शुद्ध रूप में आध्यात्मिक ही है। उसका प्रत्येक तत्व व पहलू अध्यात्म से भाविक है और सृजित है और उसका लक्ष्य एक ही है सत्य का साक्षात्कार और स्वयं में सत्य का अविष्कार जिसको महापुरुषों ने विद्वानों ने, अपनी-अपनी दृष्टि से परिभाषित किया है और जानने की कोशिश भी की है।

भारतीय वैदिक वाङ्मय तथा संस्कृति इस सनातन आध्यात्मिक चेतना को एक नए दृष्टिबोध के साथ उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी भारत के राष्ट्र निर्माताओं और दार्शनिकों जिनमें स्वामी विवेकानंद, योगी श्री अरविंद, महात्मा गांधीजी, विनोबा भावे आदि प्रमुख हैं, ने प्रस्तुत किया। यह नवजागरण का मानवीय अध्यात्म था।

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ का अध्यात्म दीप स्वामी विवेकानंद ने प्रकट किया था, जिसका प्रकाश अमेरिका तथा अन्य युरोपीय देशों तक पहुंचा था। स्वामी विवेकानंद जी ने वेदांत के तत्व को एक नई दृष्टि दी, जिससे केवल भारत ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्‍व आलोकित हो गया। स्वामी विवेकानंद ने तत्कालीन समाज में पीड़ित मानवता की सेवा में अपने अध्यात्म की खोज की। 

भारत की आध्यात्मिक परंपरा को उन्होंने ‘‘सेवा ही परमो धर्मः’’ में साकार किया । श्रीमद् भागवत के तृतीय स्कंध में कपिल मुनि द्वारा आध्यात्मिक सूत्र को देश के सामने रखा। 

कपिल मुनि द्वारा अपनी माता को जो आध्यात्मिक उपदेश दिया गया था, उसका मूल संदेश है कि परमात्मा प्रकृति के कण-कण में और सभी प्राणियों में विद्यमान है, यदि लोग प्राणिमात्र की सेवा बजाय केवल प्रतिमा में स्थूल पूजा- अर्चना करते हैं तो ऐसी उपासना केवल खोखला प्रदर्शन और दिखावा है।

अंह सर्व भूतषु भूतात्मावस्थित: सदा

तमवज्ञा मां मर्त्य: कुरुते र्चा विडाम्बनम

स्वामीजी ने भी राष्ट्र के सभी नवयुवकों का आह्वान करते हुए कहा था कि गरीबों, दलितों और वंचितों की सेवा करना ही परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ उपासना है। उन्होंने कहा, ‘‘मेरा बार-बार जन्म हो तथा मैं हजारों दु:खों को सहूं ताकि मैं उस एकमात्र परमात्मा की उपासना कर सकूं जिसका अस्तित्व है, वह एकमात्र जिसमें मुझे विश्‍वास है - सभी आत्माओं का सम्मिलित रूप और इनसे भी परे मेरा परमात्मा जो मूर्त में है, मेरा परमात्मा जो पीड़ितों में है, मेरा परमात्मा जो सभी जातियों, सभी नस्लों के निर्धनों में है- वही मेरी पूजा का विषय है।’’

भारतीय सनातन विचार दर्शन में जो बातें कहीं गई हैं, उसका सीधा सम्बंध अंतर्मन से है । इस दर्शन की धारणा है कि व्यक्ति अपने भीतरी मनोभावों से ही बाहर की प्रकृति और समाज के प्रति अपने व्यवहार और विचारों को कार्य रूप में परिणित करता है। ये विचार और व्यवहार ही जब लम्बे समय तक चलते हैं और लोगों द्वारा अपनाए जाने लगते हैं, तो वे ही जीवन मूल्य कहलाते हैं; क्योंकि वे मनुष्य की भीतरी आध्यात्मिक प्रकृति से उत्पन्न होते हैं।

अतएव विवेकानंद द्वारा सेवा को सर्वोपरि मानकर समाज के पुन: जागरण का आह्वान वास्तव में अध्यात्म से प्रसूत आंदोलन ही था।

श्रीमद् भागवत में कपिल मुनि द्वारा दूसरी महत्वपूर्ण जो बात कही गई, उसको स्वामीजी ने अपने कार्यों और आचरण से एक उदाहरण के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत किया और कहा कि भारत की उन्नति, प्रगति तथा उत्कर्ष के मूल में सेवा की सबसे प्रमुख भूमिका होगी।

कपिल मुनि के माध्यम से परमात्मा कहते हैं-

अथ मां र्वभूतेषु भूतात्मानं कृतालयम

अर्हयेद्यापमानमानाभ्यां मैत्र्या भिन्नेन चक्षुषा॥

अर्थात सभी प्राणियों में मेरी पूजा अर्चना करो, क्योंकि मैं सब में एकमेव आत्मा हूं और मैंने उनकी देह को अपना मंदिर बना लिया है, इसलिए मेरी पूजा करो, और यह पूजा दान के द्वारा लोगों के अभावों को, दु:खों को, अशिक्षा को दूर करके करिए, किंतु यह कार्य उनका आदर करते हूए करना चाहिए।

इसी सनातन आध्यात्मिक संदेश को स्वामी विवेकानंद ने अपने पुनर्जागरण का मुख्य उद्देश्य घोषित किया और राष्ट्र के नवयुवकों को मानवता की सेवा के लिए पूरी निष्ठा से जुट जाने को कहा।

 सनातन हिन्दू धर्म के मूल तत्व सेवा को पुन: प्रतिष्ठित करने का आवाहन करते हुए कहा, ‘‘मानव देह मंदिर में प्रतिष्ठित मानव आत्मा ही एकमात्र पुत्रार्थ भगवान है। अवश्य समस्त प्रणियों की देह भी मंदिर है, पर मानव देह सर्वश्रेष्ठ है, वह मंदिरों में सर्वश्रेष्ठ है। यदि मैं उसमें भगवान की पूजा न कर संकू, तो और कोई भी मंदिर किसी काम का न होगा।’’

अध्यात्म के इस सेवा तत्व को योगी अरविंद, महात्मा गांधी तथा विनोबा भावे ने सबसे प्रमुख माना। आचार्य विनोबा भावे के अनुसार ‘‘सत्य, संयम और सेवा के इन तीन सूत्रों में पारमार्थिक जीवन का अध्यात्म अंकुरित और पल्लवित होता है।

 श्रीमद् भगवतगीता, जो अध्यात्म तत्व का वैश्‍विक ग्रंथ है, उसके बारहवें अध्याय में श्री कृष्ण ने इसका बड़ा सुंदर विवेचन किया है। कृष्ण कहते हैं-

संनियम्यान्द्रिय ग्रामं सर्वत्र समबुद्धय:।

ते प्राप्तुवन्ति मामेव सर्वभूत हिते रता:|

जो व्यक्ति अपने इंद्रियों पर संयम रख कर जीवनयापन करते हैं और सभी के प्रति समान दृष्टि रखते हैं, साथ ही प्राणीमात्र के कल्याण और सेवा में लोग रहते हैं, वे अंततोगत्वा मुझे ही अर्थात परमात्मा को प्राप्त होते हैं।

 आज जब इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक के उत्तरार्ध में मानव विज्ञान, टेक्नालाजी के उत्कर्ष के कारण समस्त सुविधाओं और संसाधनों से परिपूर्ण जीवन जी रहा है, ऐसे समय में भी मानवता को आतंक, अत्याचार, हिंसा, आक्रोश से छुटकारा नहीं मिल रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था में सभी प्रकार की सुख सुविधाओं और विपुल उपग्रह पर केवल कुछ मुट्ठीभर लोग ही भौतिक सुख का लाभ उठा पा रहे हैं, दूसरी ओर करोड़ों लोग शारीरिक कुपोषण, रोग और अन्नान्य व्याधियों से ग्रस्त हैं।

किंतु जो लोग भौतिक सुख संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं, वे आध्यात्मिक कुपोषण से ग्रस्त है और यही कारण है कि सारा विश्‍व बारूद के ढेर पर बैठा है।

 जिस प्रकार से विश्‍व में आतंकवाद ने पैर पसारा है और स्थान-स्थान पर हिंसा का ताडंव हो रहा है, उससे यह निश्‍चित संकेत मिल रहे हैं कि यदि इन खतरों से बचने के लिए कोई सुनिश्‍चित प्रयत्न नहीं किए गए तो विनाश सुनिश्‍चित है। 

कई वर्ष पहले बटेर्रण्ड रसेल ने इस बात को जान लिया था, यद्यपि वे अनीश्‍वरवादी थे, आध्यात्मिकता में बहुत विश्‍वास नहीं था, फिर भी उन्होंने अध्यात्म और जीवन मूल्यों के महत्व को समझा था और कहा था‘‘जीवन मूल्य कोई यांत्रिक वस्तु नहीं है, मशीन शैतान का आधुनिक रूप है और इसकी पूजा अर्थात पैशाचिकता - चाहे प्रत्येक वस्तु मशीनी हो जाए किंतु जीवन मूल्य यांत्रिक या मशीनी नहीं हो सकते और यह एक ऐसी बात है जो किसी को भी नहीं भूलनी चाहिए|’’

सम्पूर्ण विश्‍व में आध्यात्मिक आंदोलन को चलाने की आवश्यकता और उसमें भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वामी विवेकानंद ने आज से कई वर्ष पहले अनुभव कर लिया था, तभी उन्होंने उस समय कहा था, ‘‘मेरे राष्ट्र का प्रमुख तत्व है यह लोकातीतवाद अर्थात अध्यात्म, पार जाने का यह संघर्ष, प्रकृति के मुखौटे को उतार देने का यह साहस और किसी भी कोमल तथा किसी भी प्रकार के खतरे को उठा कर उस पार की झलक पा लेना-क्या तुम इस भाव को प्रोत्साहित करना चाहते हो। ऐसा करने का एक ही रास्ता है कि राजनीति और सामाजिक पुननिर्माण के बारे तुम्हारे भाषण और पैसा कमाने के ढंग के बजाए तुम्हें संसार को आध्यात्मिक ज्ञान देना है।

 वेदांत की विचारधाराओं का प्रचार करना होगा, इन्हें न केवल जंगल और गुफाओं में वरन वकीलों और न्यायाधीशों, मंदिरों, गरीब की कुटिया, मछली पकड़ने वाले मछुआरों और विद्यार्थियों तक इस संदेश को पहुंचना होगा।’’

आधुनिक युग के कई पश्‍चिमी विचारकों ने भी अध्यात्म के इस अवदान के लिए भारत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है।

प्रसिद्ध अमेरिकी इतिहासकार बिल ड्यूटेंट ने अपने ग्रंथ ‘स्टोरी आफ सिविलाइजेशन’ के पहले खण्ड में ‘अवर ओरियंटल हेरिटेज’ शीर्षक में बताया कि ‘भारत हमें परिपक्व बुद्धि, सहनशीलता और शालीनता, अपरिग्रह, संतोष, शांति तथा सभी प्राणियों एवं प्रकृति के प्रति एकता और प्रेम की शिक्षा देने का सामर्य्थ रखता है।’ यही अध्यात्म है, जिसकी परिणति सेवा में होती है।

मानव जीवन में आध्यात्मिक दृष्टिबोध की आवश्यकता को आज बड़ी ही गहनता से अनुभव किया जा रहा है। सभी प्रकार की सुख सुविधाओं तथा संसाधनों के बावजूद जीवन में जो रिक्तता और खालीपन पैदा हो रहा है, उससे सामाजिक और वैयक्तिक जीवन बिखर रहा है।

जीवन को सफलता तथा शांति के साथ जीने के लिए विश्‍व प्रसिद्ध आध्यात्मिक विचारक दीपक चोपड़ा की एक बहुत प्रसिद्ध पुस्तक है, जिसका नाम है ‘दि सेवन स्प्रिचुअल लॉज ऑफ सक्सेस’ अर्थात सफलता के सात आध्यात्मिक नियम। उसकी भूमिका में वे लिखते हैं कि यह वास्तव में सफलता के नहीं बल्कि जीवन के आध्यात्मिक नियम हैं।उनका कहना है कि जब व्यक्ति को अपने जीवन में ईश्‍वरत्व की अद्भुत अभिव्यक्ति का अनुभव होने लगता है तभी सफलता का सही अर्थ समझ में आता है। पुस्तक के अंत में वह पाठक से तीन वचन देने की बात कहते हैं। 

ये तीनों ही वचन आध्यात्मिक दृष्टिबोध से ओतपोत हैं। वे पहले वचन के बारे में कहते हैं -अहंकार को छोड़ कर अपने आध्यात्मिक प्रयासों से अपनी श्रेष्ठता को खोजने का वचन। दूसरा- व्यक्ति अपने भीतर प्रवेश करके अपनी असाधारण योग्यता का आविष्कार करने का वचन और तीसरा तथा सबसे महत्वपूर्ण यह कि व्यक्ति मानवता के कल्याण के लिए कैसे सहायक हो सकता है, इस प्रश्‍न का स्वयं उत्तर खोज कर व्यक्ति जब अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं के साथ तालमेल बैठा कर दूसरों की सेवा और सहायता के लिए स्वयं प्रेरित होता है तो यह अध्यात्म की परिणति है।

अध्यात्म का अर्थ है अपने स्वयं के अंदर देवत्व की खोज और दूसरे को देवता मान कर उसकी सेवा और अर्चना करना।

स्वास्थ्य क्या है ? 

स्वास्थ्य की सटीक परिभाषा आयुर्वेद में प्राप्त होती है। वहां कहा गया है: समदोष: समाग्निश्च समधातु मल क्रिय:। प्रसन्नात्येन्दिय मन: स्वस्थ इत्यभिधीयते।। 

अर्थात् वह व्यक्ति स्वस्थ है जिसके तीनों दोष- वात, पित्त, कफ ठीक प्रकार से कार्य कर रहे हों। इसके साथ-साथ उसकी अग्नियां सम हों। अग्नियां 13 प्रकार की होती हैं: सात धात्वाग्नि, पांच भूताग्नि और एक जठराग्नि। भूख ठीक लगती हो और भोजन का पाचन अच्छा होता हो। सातों धातुओं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र) का निर्माण ठीक हो रहा हो। मल, मूत्र, पसीना आदि सही प्रकार से बाहर निकल रहे हो।

 अर्थात् शरीर में किसी प्रकार का रोग अथवा असंतुलन न हो। साथ ही, व्यक्ति की सभी इन्दियां (पाँचों ज्ञानेन्दियां व पांचों कर्मेन्द्रियां), मन व आत्मा प्रसन्न हों, तो ऐसे व्यक्ति को स्वस्थ कहा जाता है।

अत: स्वास्थ्य का अर्थ केवल शारीरिक या मानसिक आरोग्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक आरोग्य भी है। इस संबंध में यह भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति जितना अंतर्मुखी होगा, उतना ही ज्यादा स्वस्थ होगा। 

आज के भौतिक सुख सुविधा तकनीकी संपन्नता के सूचना प्रौद्योगिकी संचार संजाल परिवेश के हिसाब से मनुष्य ज्यादा बहिर्मुखी होता जा रहा है। इस कारण अधिकतर लोग अस्वस्थ हो रहे। 

वस्तुतः शरीर के रोगों का नाश करने की शक्ति हमारे अंदर ही है। बस उसे कुछ क्रियाओं के द्वारा बढ़ाना और पहचानना होता है। ऐसा करने से व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। अंदर की शक्तियों का जागरण आध्यात्मिक जागृति से संभव है।

आज चिकित्सा के क्षेत्र में पहले के मुकाबले बेहतर सुविधाएं, दवा और उपकरण उपलब्ध हैं, फिर भी रोगों पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? यह सही है कि पहले की अपेक्षा आज चिकित्सा के क्षेत्र में नए-नए शोध हो रहे हैं, रोगों पर काबू नहीं होने और नए घातक रोगों के सिर उठाने का कारण यह है कि हम अपने आंतरिक स्वरूप के साथ नहीं जुड़ पा रहे हैं।

जब तक हम अध्यात्म की दिशा में आगे नहीं बढ़ेंगे, तब तक रोग के घेरे में रहेंगे। इसलिए आज आध्यात्मिक स्वास्थ्य की अत्यधिक जरूरत है। अगर आध्यात्मिक स्वास्थ्य हासिल हो जाए, तो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य आसानी से प्राप्त हो जाता है।

आध्यात्मिक स्वास्थ्य से क्या तात्पर्य है? 

सनातन धर्म दृष्टि से देखें तो अपने स्वरूप में स्थित हो जाना ही आध्यात्मिक स्वास्थ्य है। यह बहुत उच्च स्थिति है। अपने स्वरूप में स्थित होना सरल बात नहीं है। इसके लिए पहले अपने स्वरूप को पहचानना होगा और उसका अनुभव करना होगा। अपने भीतर से जुड़ना होगा। 

आज सामान्यतया व्यक्ति परिवार से, धन-दौलत से, जमीन-जायदाद से, रिश्ते-नातों से ओपचारिक रूप से जुड़ता है। गहराई में देखा जाए तो वह अपने से बाहर दिखाई देने वाले शरीर से जुड़ता है। यह जुड़ना वास्तविक जुड़ना नहीं है, क्योंकि यह सब तो एक दिन छूट ही जाना है। 

स्वयं के असली स्वरूप को पहचानने के लिए बाहर का सब कुछ जाना हुआ, याद किया हुआ, पाया हुआ, बाहर ही छोड़कर शांत भाव से स्थिर हो जाना होता है। जब तक बाहर का छूटेगा नहीं, तब तक भीतर का दिव्य आत्मदर्शन मिलेगा नहीं। यह स्थिति निर्विचार की अवस्था है। इसे ध्यान की अवस्था भी कहा गया है। यह स्थिति आध्यात्मिक स्वास्थ्य की अवस्था है।

आध्यात्मिक स्वास्थ्य उपलब्धि की इस अवस्था में दृष्टा अपने ही स्वरूप में स्थित हो जाता है। जब साधक एक बार अपने स्वरूप का दर्शन कर लेता है, तब उसके भीतरी मन के मलों का नाश होने लगता है।

अनुकूलता स्थापित हो जाती है जैसे कि काम, क्रोध, लोभ और मोह उसे सताते नहीं हैं। चिंता, चिंतन में बदल जाती है। तनाव, शांति में। सुख-दुख, आनन्द में। निराशा, प्रसन्नता में। घृणा, प्रेम में तब्दील हो जाता है। हिंसा, करुणा में। झूठ, सत्य में। कामवासना, ब्रह्मचर्य में। चोरी का भाव अस्तेय में। इच्छाएं संतुष्टि में। वाणी का तीखापन कोमलता में। आहार मिताहार हो जाता है। सबके साथ मित्रता व प्रेम का भाव आ जाता है, फिर न कोई शोक होता है, न रोग होता है। अवगुणों, मलिनताओं, दुखों का स्वत: ही नाश होने लगता है। 

आध्यात्मिक स्वास्थय द्वारा आरोग्य प्राप्त ऐसे व्यक्ति के लिए फिर भी कुछ अशुभ नहीं होता, क्योंकि वह आत्मदर्शन कर चुका होता है। शरीर को स्वस्थ रखने का उसका थोड़ा प्रयास भी सार्थक सिद्ध होता है। ऐसे में योग की साधना पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करने वाली सिद्ध होती है।

अतः हम किसी भी धर्म के मानने वाले हों और ईश्वर के किसी भी स्वरुप पर आस्था रखते हों, इन सबके मूल में निहित अध्यात्म हमें स्वस्थ रहने की प्रेरणा देता है ।

 सदियों पूर्व आयुर्वेद के मनीषी सुश्रुत ने स्वास्थ्य को परिभाषित करते समय "सम दोषः समअग्निः समधातु: मल: क्रियाः प्रसन्नआत्मइन्द्रियः मनः स्वस्थमितिधीयते ! कहकर स्पष्ट की थी ।

वर्तमान के कुछ शोध से यह बात और अधिक पुख्ता साबित हुई है कि व्यक्ति की धार्मिक आस्था और विश्वास उसकी पर्सनालिटी के लिए जिम्मेदार होता है ।

वैज्ञानिक डान कोहेन, एसिस्टेंट प्रोफ़ेसर,रेलीजीयस स्टडीज, यूनिवर्सीटी आफ मिसौरी के अनुसार आध्यात्मिक चेतना विकसित होने पर व्यक्ति स्वयं ( मैं) के भाव से दूर होता हुआ विस्तृत एकात्म चिंतन अर्थात ब्रह्माण्ड से अपने जुड़ाव (एकात्मकता ) को महसूस करने लगता है ।

वर्तमान शोध के परिणामों में यह बात साफ़ देखी गयी कि इन सभी धर्मावलम्बियों में पायी गयी प्रचुर आध्यात्मिक चेतना उनके अच्छे मानसिक स्वास्थ्य से सीधे समबंधित थी । इससे पूर्व के कई शोध में भी यह पाया गया था कि सकारात्मक आध्यात्मिक चेतना व्यक्ति को विभिन्न घातक अवस्थाओं जैसे: कैंसर,रीढ़ की हड्डी की चोट या दिमागी चोट से उबरने में काफी मददगार होती है .. 

अतःसनातन धर्म संस्कृति में आस्था और विश्वास का मूल इसके अन्दर निहित आध्यात्म है जो हमें मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करने के साथ-साथ गंभीर परिस्थितियों को सरलता से जूझने में मददगार होता है साथ ही व्यक्ति आध्यात्मिक स्वास्थ्य उपलब्धि अर्जित करके अपने जीवन में सर्वांगीण प्रगति प्राप्त करके आत्म उत्कर्ष की ओर अग्रसर होता है।

🔸संपर्क🔸

 डा सुरेंद्र सिंह विरहे

उप निदेशक

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी संस्कृति परिषद् भोपाल

शोध समन्वयक

आध्यात्मिक नैतिक मूल्य शिक्षा शोध

धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग मध्य प्रदेश शासन

 मनोदैहिक आरोग्य आध्यात्मिक स्वास्थ्य विषेशज्ञ एवं लाईफ कोच, स्प्रिचुअल योगा थेरेपिस्ट


स्थापना सदस्य

मध्य प्रदेश मैंटल हैल्थ एलाइंस चोइथराम हॉस्पिटल नर्सिंग कॉलेज इंदौर


निदेशक

दिव्य जीवन समाधान उत्कर्ष

Divine Life Solutions Utkarsh


पूर्व अध्येता

भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद् दिल्ली


"Philosophy of Mind And Consciousness Studies"


Ex. Research Scholar

At: Indian Council of Philosophical Research ICPR

Delhi


utkarshfrom1998@gmail.com


9826042177,

8989832149


Monday, November 21, 2022

पति पत्नी के रिश्ते को अच्छे से निभाने के लिए क्या करें !

 पति पत्नी का रिश्ता दुनिया में सबसे ज्यादा चुनौती पूर्ण और अनमोल है। पति पत्नी के रिश्ते की खुबसूरती है आपसी तालमेल, विश्वास,परवाह,समन्वय, निस्वार्थ सेवा भाव और अटूट प्रेम । यह एक ऐसा आपसी मधुर संबंध है जिसमें एक दूसरे को हर पल आश्वस्त करना सहयोग सुरक्षा संरक्षण प्रदान करना व निष्ठा के साथ सतत निभाने की सुनिश्चितता प्रदान करना अत्यंत आवश्यक होता है।

आजकल की भागम भाग भरी जिंदगी में आपसी संबंधों में टूटन दरार, बिखराव और तनाव बढ़ता जा रहा है ऐसे में अगर पति पत्नी के रिश्ते में भी खटास आ जाए तो यह अत्यंत चिंताजनक स्थिति की ओर इशारा करता है क्योंकि इसका सीधा बुरा असर आपके परिवार बच्चों पर पड़ता है। दुनिया में सबसे ज्यादा कीमती अगर कुछ है तो वह है अपनों की अपने परिवार की खुशी। इसे कायम रखने के लिए हर संभव कोशिश की जानी चाहिए।

पति पत्नी का रिश्ता दुनिया में सबसे ज्यादा सुखद रोमांचक और अनूठा होता है जीवन की बड़ी से बड़ी चुनौतियों को कठिनाइयों को दूर करने में यह रिश्ता प्रेरणा व हौंसला प्रदान करने वाला होता है। इंसान की सफलता और उपलब्धियों के पीछे दांपत्य जीवन की अनुकूलता अत्यंत जरूरी है । 

विवाह संबंध निर्वहन में इस अनमोल रिश्ते को निभानें में पति पत्नी की बराबर की भूमिका दांपत्य जीवन पारिवारिक सुख सुविधा जुटान ,प्रबंधन करने की कला में दोनों का निपुण होना अत्यंत आवश्यक होता है।

पत्नी अपनी ग्रह कार्य , साज सज्जा, सफाई पाक कला और सजने संवरने , सौंदर्यवान बनने की कुशलता दक्षता के साथ पति को सेवा सुविधा एवं समर्पण भाव से प्रेम प्रदान करती है।

इसी तरह से पति अपने कर्तव्य निर्वहन के साथ पत्नी को रोटी कपड़ा मकान, भरण पोषण , संरक्षण सेवा ,सुख सुविधा और आजीवन अनेकों भेंट देने के साथ भरपूर प्रेम आनंद प्रदान करने की व्यवस्था करता है।


उपरोक्त समझोते संदर्भ के साथ परस्पर विवाह संस्कार के वचनों को निभाते हुए पति पत्नी अपने रिश्ते को अच्छे से कायम रख सकते हैं।


इसके अलावा पति पत्नी के रिश्ते को अच्छा रखने के लिए एक दूसरे के स्वभाव आदत, पसंद ना पसंद को ध्यान में रखते हुए हर पल हर दिन सुख भोग आनंद प्रदान करने की नित नई आश्चर्य चकित करने लुभाने, रिझाने, बच्चों की तरह लड़ने झगड़ने एक दूसरे को रूठने मनाने बहलाने की चेष्ठा प्रवृत्ति को कायम रखना अत्यंत आवश्यक होता है

और साथ ही एक दूसरे की शक्ति खूबी विशेषता को जान कर प्रोतसाहित प्रेरित करना व गलतियो ,कमजोरियों को सुधारने में सहयोग प्रदान करना जरूरी होता है कभी कभी एक दूसरे के अनजाने में हुए गलत बुरे आचरण बर्ताव को नजरंदाज कर फिर से नई शुरआत करने का सिलसिला जारी रखना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।इसके अतिरिक्त आप स्वयं जो जरूरी समझते हैं उसे कमेंट में लिखकर भेंजे।

🔸संपर्क🔸

*डा सुरेंद्र सिंह विरहे

उप निदेशक

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी संस्कृति परिषद् संस्कृति विभाग एवं

शोध समन्वयक

आध्यात्मिक, नैतिक मूल्य शिक्षा शोध

धार्मिक न्यास धर्मस्व विभाग मध्य प्रदेश शासन भोपाल*

*मनोदैहिक आरोग्य आध्यात्मिक स्वास्थ्य विषेशज्ञ एवं लाईफ कोच, स्प्रिचुअल योगा थेरेपिस्ट*


*स्थापना सदस्य

मध्य प्रदेश मैंटल हैल्थ एलाइंस चोइथराम हॉस्पिटल नर्सिंग कॉलेज इंदौर*


*निदेशक

दिव्य जीवन समाधान उत्कर्ष

Divine Life Solutions Utkarsh*


*पूर्व अध्येता

भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद् दिल्ली


"Philosophy of Mind And Consciousness Studies"


JRF At: Indian Council of Philosophical Research ICPR

Delhi*


utkarshfrom1998@gmail.com


9826042177,

8989832149




Saturday, November 19, 2022

स्त्री के अस्तित्व पर अमानवीय कृत्य की शर्मनाक घटना बलात्कार

स्त्री के अस्तित्व पर अमानवीय कृत्य की शर्मनाक घटना बलात्कार भारत में भयावह रूप लेती जा रही है।

महिलाओं बच्चियों एवम युवतियों का मानसिक स्वास्थ्य बलात्कार की पीढ़ा सहन करने से पूरी तरह बिगड़ जाता है। 

यौन हिंसा का प्रभाव पूरी तरह से विनाशकारी हो सकता है, जो केवल शारीरिक आघात तक ही सीमित नहीं है बल्कि भावनात्मक संकट तक भी फैलता है। हमले से उत्पन्न भावनात्मक दर्द इतना कष्टदायी होता है कि यह पीड़ित को बेड़ियों में जकड़ देता है, जिससे वह चिंतित, भयभीत, लज्जित और यहां तक ​​कि फ्लैशबैक, कष्टप्रद यादों और बुरे सपने से भी पीड़ित हो जाती है।

अक्सर बलात्कार से बचे लोग मनोवैज्ञानिक निशान (सायकोलॉजिकल मार्क) झेलते हैं और मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों से लगातार निपटते हैं जिनमें अवसाद (डिप्रेशन), चिंता, अभिघातजन्य तनाव विकार (पोस्ट ट्रॉमेटीक स्ट्रेस डिसऑर्डर) (जिसे पीटीएसडी भी कहा जाता है), मादक द्रव्यों (नारकोटिक) के सेवन के वजह से विकार, शराब, नशीली दवाओं की लत, क्रोनिक फेटिग, सामाजिक वापसी, नींद विकार (स्लीपिंग डिसऑर्डर), एनोरेक्सिया बुलिमिया, और सीमा रेखा व्यक्तित्व विकार (बॉर्डर लाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर) शामिल हैं। 

समाज में लव जेहाद के लगातार बढ़ते मामलों चिंताजनक है । युवती किशोर अवस्था की बच्चियों की हत्या कर दी जाती है।यह सब षड्यंत्र के रूप में सामने आ रहे हैं।

इस तरह के यौन हमलों के कारण होने वाला आघात गंभीर होता है और इसके बाद अक्सर असहायता, अपराधबोध (गिल्ट), आत्म-दोष (सेल्फ ब्लेम) की भावनाएँ आती हैं। कई मामलों में पीड़ित घटी हुई घटना से इतने घबरा जाते हैं कि वे आईने से बचने लगते हैं।

आज हमारे समाज की सबसे दर्दनाक सच्चाई यह है कि पीड़ित को अपमानित किया जाता है और उसकी अवहेलना (डिसरिगार्ड) की जाती है और अक्सर उसे दोषी ठहराया जाता है। संरचित प्रणाली (स्ट्रक्चर्ड सिस्टम) हमेशा उत्तरजीवियों (सर्वाइवर्स) को मानसिक शांति प्रदान करने में विफल रहती है।

बलात्कार लव जेहाद के इन मामलों में सरकार को गंभीरता से लेते हुए कड़े कानून सजा का प्रावधान करना होगा अन्यथा समाज में अराजकता फैल जाएगी सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ जाने के खतरें है।

माता पिता अभिभावक अपने बच्चों को संस्कार देकर सदैव सतर्क व जागरूक करें एवम चारित्रिक विकास पारिवारिक जीवन में आपसी विश्वास परवरिश में कभी कोई कमी न रखें।

सनातन धर्म संस्कृति को युवा पीढ़ी आत्मसात कर अपने जीवन में अध्यात्म को अंगीकार करें।

योग ध्यान प्राणायाम के नियमित अभ्यास द्वारा बलात्कार पीड़ित को संवेदनात्मक भावात्मक रूप से उस दुखद घातक घटना से उबरने में मदद करें।लगातार संवाद करके आत्म विश्वास कायम कराने में सहानुभूति बनाए रखें।


Wednesday, November 16, 2022

अगर सोशल मीडिया नही होता तो जीवन कैसा होता?

अगर सोशल मीडिया नही होता तो जीवन कैसा होता?

सोशल मीडिया नही होता तो जीवन अत्यंत सुखद अनुभव और आत्मीय आनंद अनुभूतियों से ओतप्रोत दिव्य होता। किसी की भी जिंदगी यूं उलझी बिखरी हुई न होती।किसी की भी पहचान नकली वर्चुअल वर्ल्ड में नही फसी होती।

सहज सरल स्वाभाविक रूप जीना आसान होता परिणाम स्वरूप लोगों के जीवन में प्रकृति के सौंदर्य और आपसी रिश्तों के प्रति लगाव बना रहता।

झूठी शान दिखावा भौतिक सुख सुविधा की दौड़ की जगह सुकून शांति सौहार्द और पारस्परिक संबंधों में अपनापन बरकरार रहता l लेकीन दुर्भाग्यवश मनुष्य ने अपनी अति की प्रवत्ति के चलते विज्ञान को वरदान बनाने के बजाय अभिशाप बना दिया है।

आज सूचना प्रौद्योगिकी संचार माध्यम नई कंप्यूटर मोबाइल इंटरनेट की तकनीकी मौलिक ज्ञान से दूर कर रही है केवल सूचनाओं का संजाल फैलता चला जा रहा है। व्यक्ति पूरी तरह से सिलिकॉन के वशीभूत होकर अपने आप को इस आत्मघातक तकनीकी में उलझाकर इसका गुलाम होता चला जा रहा है।

वास्तव में आज सूचना प्रौद्योगिकी संचार माध्यम नित नई डिजिटल वर्चुअल दुनिया इंसानी जीवन पर नियंत्रण काबिज किए जा रही है। 

आज हम सिर्फ एक डेटा या नंबर बनकर रह गए हैं । हमारी नैसर्गिक प्रतिभा योग्यता सक्षमता इस साइबर वर्चुअल वर्ल्ड में खोती चली जा रही है।

बचपन की मासूमियत चंचलता खत्म होती जा रही है मोबाइल इंटरनेट गेम की लत , मकड़जाल रूपी ऐप चलाना, 24 घंटे ऑनलाइन रहना, लाइव वीडियो बनाने की, उल जुलूल ,फुहड़ ,अश्लील ,भद्दी गालियां देते हुए गंदी मजाकिया रील, टिक टॉक बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करना आज बच्चों महिलाओं और युवा किशोर बच्चों में फैशन सा बन गया है ।

जैसे तैसे इन वीडियो संदेश पोस्ट पर लाइक पाने की होड़ मची हुई रहती है।कुछ भी तथ्यहीन, नाटकीय, अन नैचुरल, झूठे बर्ताव,भांड प्रदर्शन को तेजी से इंटरनेट पर सोशल मीडिया में वायरल कराने की विकृत मानसिकता समाज में व्यसन की तरह फैलती ही जा रही है।

 किसी आकस्मिक घटना,दुर्घटना के समय मदद करने के बजाय लोग हताहत घायल हुए पीड़ित व्यक्ति का वीडियो बनाने लग जाते हैं । इस सोशल मीडिया वायरल संक्रमण के कारण लोगों में संवेदनशीलता कम होती जा रही है।

उपरोक्त वस्तुस्थति का चित्रण नकारात्मक लग रहा होगा लेकिन आज समाज की यही सच्चाई है। 

हिंसा ,भ्रष्टाचार, असंवेदनशीलता के लगातार पनपने और नैतिक मूल्यों के लगातार पतन से लोगों में चारित्रिक पतन भी देखने को मिल रहा है। रिश्ते परिवार बिखर रहें हैं।

परिणाम  स्वरूप लोगों में तनाव अवसाद बढ़ता ही चला जा रहा है। लोग मानसिक रूप से बीमार होने लगे हैं। अलगाव ,एकाकीपन और अनिंद्रा रोग भी तेजी से बढ़ता जा रहा है। युवाओं में जिंदादिली के बजाय आत्महत्या प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

आधुनिक विज्ञान सूचना प्रौद्योगिकी संचार तकनीकी के मानवीय जीवन पर प्रभाव और इससे जुड़े सरोकार को भी गंभीरता से समझने की आज आवश्यकता है।

5 जी स्पीड इंटरनेट के दुष्परिणाम को भी व्यक्तिगत ,पारिवारिक, पर्यावरणीय, सामाजिक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय स्तर पर सरकार को जानना समझना चाहिए। सोशल मीडिया के नियंत्रण के लिए, इससे होने वाली हानि क्षति को लेकर भी नीति कार्यक्रम बनाना चाहिए।

🔸संपर्क🔸

डा सुरेंद्र सिंह विरहे

उप निदेशक

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी संस्कृति परिषद् भोपाल

शोध समन्वयक

धार्मिक न्यास धर्मस्व विभाग मध्य प्रदेश शासन

मनोदैहिक आरोग्य आध्यात्मिक स्वास्थ्य विषेशज्ञ एवं लाईफ कोच, स्प्रिचुअल योगा थेरेपिस्ट


स्थापना सदस्य

मध्य प्रदेश मैंटल हैल्थ एलाइंस चोइथराम हॉस्पिटल नर्सिंग कॉलेज इंदौर


निदेशक

दिव्य जीवन समाधान उत्कर्ष

Divine Life Solutions Utkarsh

पूर्व अध्येता

भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद् दिल्ली

"Philosophy of Mind And Consciousness Studies"

Ex. Research Scholar

At: Indian Council of Philosophical Research ICPR Delhi

utkarshfrom1998@gmail.com


9826042177,

8989832149


Saturday, November 12, 2022

छोटी बुद्धि संकीर्ण मानसिकता से मुक्त होकर कुशाग्र दूरदर्शी बनें

छोटी बुद्धि  संकीर्ण मानसिकता से मुक्त होकर कुशाग्र दूरदर्शी बनें 

छोटी बुद्धि के लोग मतलब संकीर्ण सोच के लोग जो अत्यंत सीमित सोच विचार का दायरा रखते हैं जो तात्कालिक स्वार्थ सिद्ध करने में तत्पर रहते हैं उन्हें कल की या भविष्य के परिणाम से कोई मतलब नहीं होता है हमेशा जुगाड जमाने में तिकड़म भिड़ाने में खुराफात मचाने में लगे रहते हैं ऐसे लोग ही छोटी बुद्धि वाले लोग कहलाते हैं इस तरह के लोग प्रामाणिक नही हो सकते इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

जैसा कि स्पष्ट ही है संकीर्ण यानी संकुचित सोच विचार जिससे व्यक्ति का नजरिया भी सीमित हो जाता है । संकीर्ण मानसिकता भीरू दब्बू कुंठित अल्पज्ञ लोगों की होती है ऐसे लोग अत्यंत लोभी भ्रष्ट आचरण के बेईमान होते हैं। धोखा में रखना धोखा देना इनकी फितरत होती है। कभी भी किसी बड़े प्रयोजन अथवा व्यापक परिप्रेक्ष्य की योजना लक्ष्य संकीर्ण मानसिकता के चलते सफल नहीं हो पाते हैं।

छोटी बुद्धि संकीर्ण मानसिकता को दर्शाती है जिसमें किसी भी तरह के व्यवहार को नैतिक मूल्य की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता है छोटी बुद्धि यानी अल्पज्ञ होना है।बुद्धि के विकास के लिए संपर्क करें बुद्धि कौशल को बढ़ावा देने हेतु योग आध्यात्म जीवन प्रबंधन ज्ञान को सीखें और अपनी मूल प्रतिभा को जानें।

जीवन में छोटी सोच और पैर की मोच की कहावत को चरितार्थ करने वाले सैकड़ों लोग हमे अपने आस पास मिल ही जाते हैं।

जिनके जीवन में लक्ष्य या भविष्य की कोई योजना  नहीं होती है ऐसे लोग हमेशा अल्प प्रयास से बड़ी सफ़लता पाने की जुगाड लगाने में प्रवृत्त रहते हैं इनकी सोच विचार की क्षमता अत्यंत सीमित होती है। 

आजकल की पूंजीवादी उपभोक्ता भोगवादी स्वार्थांध आपाधापी व्यवस्था में हर व्यक्ति संकीर्णता और नैतिक पतन की ओर अग्रसर होता चला जा रहा है आपसी विश्वास कम होता जा रहा है। परिणामस्वरूप आपसी रिश्तों में तनाव बढ़ता जा रहा है। लोगों का मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा है।जिसके कारण समाज में नकारात्मकता, भय, व्यसन, शराब खोरी,भ्रष्टाचार,दुराचार जैसी बुराइयां लगातार फैल रही है। 

खासकर नई पीढ़ी में नैतिक पतन ज्यादा देखने को मिल रहा है। जीवन संघर्ष करने में आज की युवा पीढ़ी कमजोर और निराश होती जा रही है।जिसके कारण उनमें पलायन और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

यदि हम समाज में तेजी से फैल रही उदासीनता संकीर्ण मानसिकता को नियंत्रित नहीं करेंगे तो भविष्य में इसके परिणाम और भी घातक हो सकते हैं। छोटी बुद्धि वाले अर्थात अल्पज्ञ अज्ञानी कम पड़े लिखें लोग आसानी से बुराइयों व अपराध की ओर अग्रसर हो जाते हैं। 

समाज में व्याप्त उपरोक्त विसंगतियों को बढ़ावा ना मिले इसके लिए सकारात्मकता को बढ़ावा देना होगा और नैतिक मूल्यों के संरक्षण के प्रयास करने होंगे।

महापुरुषों के जीवन चरित्र, आदर्श महान व्यक्तित्व कृतित्व को नई शिक्षा व्यवस्था में सम्मिलित कर योग ध्यान आध्यात्म की ओर नई पीढ़ी को प्रेरित करना होगा।

आज के युवा छोटी बुद्धि  संकीर्ण मानसिकता से मुक्त होकर कुशाग्र दूरदर्शी बनें ऐसे विकल्प माध्यम प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने होंगे।

🔸संपर्क🔸

 डा सुरेंद्र सिंह विरहे

 मनोदैहिक आरोग्य आध्यात्मिक स्वास्थ्य विषेशज्ञ एवं लाईफ कोच, स्प्रिचुअल योगा थेरेपिस्ट

उप निदेशक

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी संस्कृति परिषद् भोपाल

शोध समन्वयक

आध्यात्मिक नैतिक मूल्य शिक्षा शोध

धार्मिक न्यास धर्मस्व विभाग मध्य प्रदेश शासन

स्थापना सदस्य

मध्य प्रदेश मैंटल हैल्थ एलाइंस चोइथराम हॉस्पिटल नर्सिंग कॉलेज इंदौर


निदेशक

दिव्य जीवन समाधान उत्कर्ष

Divine Life Solutions Utkarsh


पूर्व अध्येता

भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद् दिल्ली


"Philosophy of Mind And Consciousness Studies"


Ex. Research Scholar

At: Indian Council of Philosophical Research ICPR

Delhi


utkarshfrom1998@gmail.com


9826042177,

8989832149


Tuesday, November 8, 2022

हिंदु विरोध, सनातन धर्म, हिंदुत्व पर षडयंत्र हिंदू धर्म अपमान पर अंकुश हेतु सनातन जागृति अभियान की आवश्यकता है

आजकल लगातार हिंदू सनातन संस्कृति धर्म पर भ्रामक दुष्प्रचार करने का एक चलन सा हो गया है। हिन्दुत्व,हिन्दू धर्म को किसी भी तरह गलत साबित करने की कोशिश कुछ सनातन हिंदू धर्म विरोधियों द्वारा की जा रही है ।

जो ईसाइयत या अरबी संस्कृति से जुड़े हैं। उनके द्वारा भारत वर्ष की संस्कृति को नीचा दिखाने के लिये हर संभव प्रयत्न किये जा रहे हैं।

हिन्दू धर्म संयम त्याग और बलिदान का धर्म है। हमेशा दूसरे धर्मो को सम्मान देने वाला धर्म है। हिन्दू धर्म पर आरोप लगाने वाले मूर्ख लोग देश की संस्कृति को अन्य कबिलाई, अरबी संस्कृति के समक्ष नीचा दिखाने की कोशिश करने मे लगे हुए हैं।

सनातन धर्म का वसुधैव कुटुंबकम् संदेश समाज, युवाओं तक अवश्य पहुँचना चाहिए अगर हम सभ्यताओं के इस युद्ध में सनातन धर्म संस्कृति विरोधियों पर विजय प्राप्ति की कामना करते हैं। परंतु हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारा सनातन हिंदू संस्कृति धर्म रक्षा जाग्रति अभियान कार्यक्रम सनातन सत्य के साथ आक्रामक प्रभावी होना चाहिए व तथाकथित छद्म धर्मनिरपेक्षता पक्षधर न्यूनकारी “प्रचारकों” के हाथों में ना चला जाए, जो कि सनातन धर्म और हिंदू धर्म को धार्मिक संस्कारों एवं नियमों में बांधने में ही प्रसन्न रहते हैं।

सनातन धर्म अत्यधिक एकीकृत एवं पूर्णता से जीवन जीने के मार्ग का प्रतिनिधित्व करता है जो कि एक ही समय पर सूक्ष्म भी है और जटिल भी है। इसे सरल प्रकार के नियमों और अनुष्ठान में परिवर्तित कर एक और रूढ़िवादी धर्म बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जिस क्षण सनातन धर्म को रूढ़िवादी प्रथाओं और अनुष्ठानों में परिवर्तित कर दिया जाएगा, उसी क्षण वह विश्व के अन्य धर्मों के स्थान पर आ जाएगा। यह किसी भी परिस्थिति में नहीं होने देना चाहिए। सनातन धर्म स्वयं जीवन है, वह पूर्ण एवं विकासशील है, और इसे इसी रूप में जानना एवं देखना चाहिए।

सनातन धर्म तथा हिंदू धर्म में गहन प्रतिकात्मकताएं समायोजित हैं। हम में इस प्रतीकात्मकता को बिना अधिक सरल बनाए या बिना उसकी गूढ़ता कम किए समझाने की क्षमता होनी चाहिए। इस कार्य के लिए बहुत सचेत बौधिक पथ प्रदर्शित करने की क्षमता की कार्य योजना की आज नितांत आवश्यकता है।

बौधिक अभिजात वर्ग के लोग जिस एक महत्वपूर्ण कारण से हिंदू सनातन धर्म से सावधान एवं दूर रहते हैं, वह कारण इसके जटिल एवं गहन प्रतीकवाद को जनसाधारण को समझाने में आने वाली निरी कठिनाई है। सरलीकरण का तात्पर्य वास्तविक अर्थ को कम करना नहीं होना चाहिए। 

हिंदु विरोध, सनातन धर्म, हिंदुत्व पर षडयंत्र हिंदू धर्म अपमान पर अंकुश हेतु सनातन जागृति अभियान की आवश्यकता है ।

सनातन धर्म का यह कार्य विशाल एवं गहन है, यह किसी एक व्यक्ति या समूह के द्वारा नहीं किया जा सकता, सभी को इस विशाल यज्ञ के लिए एकत्रित होना चाहिए; धर्म के लिए यह त्याग आवश्यक है। हर एक व्यक्ति आवश्यक है, और सब को अपना उच्चतम एवं श्रेष्ठतम योगदान देना होगा। यह कार्य सर्वसहयोगी एवं एकीकरण वाला होना चाहिए – यहाँ दाँव बहुत उच्च है और समय तीव्रता से निकल रहा है।

हिंदू हिंदुत्व पर प्रश्नचिन्ह लगा कर हिंदू धर्म संस्कृति विरोधियों,धर्मांतरण कराने वाले राष्ट्र द्रोही तत्वों को प्रश्रय देकर राहुल गांधी भारत जोड़ो नहीं भारत तोड़ो के मिशन पर गुप्त षडयंत्र के द्वारा हिन्दुओं को बाटने तोड़ने की राजनीति यात्रा कर रहें हैं।

कांग्रेस लगातार हिंदू विभाजन विभेद वैमनश्य फैला रही है ।

कर्नाटक कांग्रेस के कार्यकारी राज्य अध्यक्ष सतीश जारकीहोली ने हिंदू शब्द की उत्पत्ति पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि हिंदू शब्द कहां से आया? यह फारसी है। भारत का क्या संबंध है? यह आपका कैसे हो गया हिंदू? उन्होंने एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा है कि अगर आपको हिंदू शब्द के मायने पता चलेंगे तो आपको शर्म आ जाएगी। इसका मतलब बहुत गंदा होता है।

हिंदू को गंदा बोलने के पीछे नफरत की षडयंत्र कारी सोच दर्शाता है। इससे पहले राहुल गांधी ने ही हिंदू हिंदुत्व पर भ्रामक परिभाषा दी थी।

हिंदू आतंक से लेकर राम मंदिर का विरोध करने से लेकर गीता को जिहाद से जोड़ने तक,हिन्दू धर्म का तालिबानीकरण शुरू हो गया है? सलमान खुर्शीद हिंदुत्व की तुलना आतंकी संगठन आईएसआई से करते हैं ऐसे बयान यह संयोग नहीं बल्कि कांग्रेस की येन केन प्रकरेन षडयंत्र विवाद रचकर सत्ता की भूख को दर्शाता है। कांग्रेस की हिंदू हिंदुत्व विरोधी विचारधारा कुत्सित मानसिकता को आमजन के सामने उजागर करना होगा।

वन्ही दूसरी ओर इसी षडयंत्र के चलते राजस्थान में लगातार धर्मांतरण की साजिश रची जा रही है हिंदुओ के 400 परिवारों को प्रलोभन देकर ईसाई मिशनरियों द्वारा हिंदुओ का धर्मांतरण कराने की साजिश का खुलासा हुआ है लगभग 10 हजार हिन्दुओं को एकसाथ प्रलोभन देकर ईसाई मिशनरियों द्वारा हिंदू धर्म का विरोध अपमान कराना सिखाया जाता है।

राजस्थान सरकार कांग्रेस की शासन व्यवस्था इसे रोकने में विफल रही है।

गरीब दलित आदिवासी हिंदुओ को लगातार ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है।

आखिर क्यों हिन्दुओं के प्रति कांग्रेस नफरत अलगाव व हिंदू धर्म अपमान करने का एजेंडा चला रही है?

हिंदु विरोध हिंदुत्व पर षडयंत्र रच कर कांग्रेस किस तरह का विभाजनकारी ध्रुवीकरण का खेल रच रही है।क्या राहुल की भारत जोड़ो यात्रा सिर्फ दिखावा है असली उद्देश्य हिंदू विरोध तोड़ने बांटने नफरत को बढ़ावा देना है।

सनातन धर्म हिंदू संस्कृति को अपमानित करने वालों के खिलाफ़ व्यापक विरोध आंदोलन एवम हिंदू धर्म विरोधियों को सबक सिखाना होगा। कांग्रेस विरुद्ध एकजुटता से इनकी षडयंत्रकारी योजनाओं को विफल करना होगा।

हिंदु विरोध, सनातन धर्म, हिंदुत्व पर षडयंत्र हिंदू धर्म अपमान पर अंकुश हेतु सनातन जागृति अभियान की आवश्यकता है ।

🔸संपर्क🔸

डा सुरेंद्र सिंह विरहे

उप निदेशक

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी संस्कृति परिषद् भोपाल

शोध समन्वयक

आध्यात्मिक नैतिक मूल्य शिक्षा शोध

धार्मिक न्यास धर्मस्व विभाग मध्य प्रदेश शासन


मनोदैहिक आरोग्य आध्यात्मिक स्वास्थ्य विषेशज्ञ एवं लाईफ कोच, स्प्रिचुअल योगा थेरेपिस्ट


स्थापना सदस्य

मध्य प्रदेश मैंटल हैल्थ एलाइंस चोइथराम हॉस्पिटल नर्सिंग कॉलेज इंदौर


निदेशक

दिव्य जीवन समाधान उत्कर्ष

Divine Life Solutions Utkarsh


पूर्व अध्येता

भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद् दिल्ली


"Philosophy of Mind And Consciousness Studies"


Ex. Research Scholar

At: Indian Council of Philosophical Research ICPR

Delhi


utkarshfrom1998@gmail.com


9826042177,

8989832149

Tuesday, November 1, 2022

धर्म, सनातन संस्कृति, परिवार के संरक्षण के लिए तथा सुखी समृद्ध आरोग्य युक्त जीवन जीना हो तो संकल्प लीजिए ...

धर्म, सनातन संस्कृति, परिवार के संरक्षण के लिए तथा सुखी समृद्ध आरोग्य युक्त जीवन जीना हो तो संकल्प लीजिए ...

विवाह संस्कार के लिए:-

संकल्प लीजिए कि , कन्याओं का विवाह 21 से 25 वे वर्ष तक, और लड़कों का विवाह 25 से 29वें वर्ष की आयु तक हर स्थिति में बिना दहेज व दिखावे के हो जाना चाहिए !

जमीन से जुड़े,आस पड़ोस सामाजिक ताने बाने के लिए :-

संकल्प लीजिए कि , फ्लैट न लेकर जमीन खरीदो, और उस पर अपना घर बनाओ! वरना आपकी संतानों का भविष्य पिंजरे के पंछी की तरह हो जाएगा* इसलिए बिना किसी भेदभाव के आस पड़ोस की सामाजिक सांस्कृतिक समरसता के साथ बच्चों का लालन पालन करें। 

संयुक्त परिवार व्यवस्था की पुनः स्थापना के लिए:-

संकल्प लीजिए कि , नयी युवा पीढ़ी को कम से कम तीन संतानों को जन्म देने के लिए प्रेरित करें !जिससे काका काकी, मामा मामी, बुआ, भाभी आदि रिश्ते कायम रहें।

अपनी मूल जड़ों से जुड़े रहने के लिए:-

संकल्प लीजिए कि , गांव से नाता जोड़ कर रखें ! और गांव की पैतृक सम्पत्ति, और वहां के लोगों से नाता, जोड़कर रखें ! सप्ताह में एक दो दिन ग्रामीण जीवन जिएं।

सनातन धर्म व आध्यात्मिक संस्कृति के रक्षार्थ नई पीढ़ी के लिए:-

संकल्प लीजिए कि , अपनी संतानों को अपने धर्म की शिक्षा अवश्य दें, और उनके मानसिक , शारीरिक,आध्यात्मिक विकास पर अवश्य ध्यान दें !

सतर्क सावधान हो किसी भी अप्रत्याशित हानि से बचने के लिए:-

संकल्प लीजिए कि , किसी भी संदिग्ध और आतंकवादी प्रवृत्ति के व्यक्ति से सामान लेने-देने, व्यवहार करने से यथासंभव बचें ! राष्ट्रद्रोही, जेहादी, असामाजिक तत्वों का बहिस्कार करें।

स्वावलंबन के साथ जीने के लिए:-

संकल्प लीजिए कि , घर में बागवानी करने की आदत डालें,(और यदि पर्याप्त जगह है,तो देशी गाय पालें। ज़हरीले रसायनिक खाद पदार्थ व मिलावट के आहार से बचें।

तीज त्यौहार पर्व पारिवारिक प्रेम सौहार्द के लिए:-

संकल्प लीजिए कि , होली, दीपावली,विजयादशमी, नवरात्रि, मकर संक्रांति, जन्माष्टमी, राम नवमी, आदि जितने भी  त्यौहार आयें, उन्हें आफिस/कार्य से छुट्टी लेकर सपरिवार मनाये। 

प्रकृति पर्यावरण संरक्षण के लिए:-

संकल्प लीजिए कि , पौधारोपण को बढ़ावा देंगे !(हो सके तो पैदल चलने को अपनाए, व परिवार के साथ प्राकृतिक स्थल का भ्रमण करें )

स्वस्थ दिनचर्या आरोग्य के लिए:-

संकल्प लीजिए कि , प्रात: काल 5-5:30 बजे उठ जाएं, और रात्रि को 10 बजे तक सोने का नियम बनाएं ! सोने से पहले आधा गिलास पानी अवश्य पिये (हार्ट अटैक की संभावना घटती है)

कर्म कौशल श्रम की प्रतिष्ठा के लिए:-

संकल्प लीजिए कि ,यदि आपकी कोई एक संतान पढ़ाई में असक्षम है, तो उसको कोई भी हुनर (Skill) वाला ज्ञान जरूर दें !

धर्म शास्त्र स्वाध्याय के लिए:-

संकल्प लीजिए कि आपकी प्रत्येक संतान को कम से कम तीन धर्म ग्रंथ गीता, रामायण वेद उपनिषद् स्वाध्याय के लिए प्रेरित करेगें।

सामाजिक सांस्कृतिक विरासत परंपरा निर्वहन के लिए:-

संकल्प लीजिए कि जब भी परिवार व समाज के किसी कार्यक्रम में जाएं, तो अपनी संतानों को भी ले जाएं ! इससे उनका मानसिक विकास सशक्त होगा !

बुद्धू बक्सा टीवी एवम मोबाइल लत वर्चुअल दुनिया के संक्रमण से बचने के लिए:-

संकल्प लीजिए कि परिवार के साथ मिल बैठकर भोजन करने का प्रयास करें, और भोजन करते समय मोबाइल फोन और टीवी बंद कर लें ! शयन कक्ष एवम शौचालय में मोबाइल ना उपयोग करें। 

फिल्म वेब सीरिज के दुष्प्रभाव से बचने के लिए:-

 संकल्प लीजिए कि अपनी संतानों को बालीवुड की कचरा फिल्मों से बचाएं, घटिया वेब सीरिज न देखें और प्रेरणादायक फिल्में दिखाएं !

आहार शुद्धि के लिए:-

 संकल्प लीजिए कि जंक फूड और फास्ट फूड से बचें ! सात्विक आहार अपनाएं।

सुप्रभात व संध्या उपासना के लिए:-

संकल्प लीजिए कि प्रातः संध्या अग्निहोत्र करेगें व सांयकाल के समय कम से कम 10 मिनट भक्ति संगीत सुने, बजाएं !

व्यर्थ के खर्चे से बचने के लिए:-

संकल्प लीजिए कि  दिखावे के चक्कर में पड़कर, व्यर्थ का खर्चा न करें। मितव्ययता के लिए ऑन लाइन खरीदी की आदत छोड़ दें !

स्वास्थ्य पर्यावरण संरक्षण के लिए:-

संकल्प लीजिए कि  दो किलोमीटर तक जाना हो, तो पैदल जाएं, या साईकिल का प्रयोग करें !

नशे व्यसन मुक्त होने के लिए:-

संकल्प लीजिए कि अपनी संतानों के मन में किसी भी प्रकार के नशे (गुटखा, तंबाखू, बीड़ी, सिगरेट, दारू...) के विरुद्ध चेतना उत्पन्न करें,तथा उसे विकसित करें !

सात्विकता को बढ़ावा देने के लिए:-

संकल्प लीजिए कि सदैव सात्विक भोजन ग्रहण करें, अपने भोजन का ईश्वर को भोग लगा कर प्रसाद ग्रहण करें ! 

संकल्प लीजिए कि अपने आंगन में तुलसी का पौधा अवश्य लगायें, व नित्य प्रति दिन पूजा, दीपदान अवश्य करें !

आत्म रक्षा के लिए:-

 संकल्प लीजिए कि अपने घर पर एक हथियार अवश्य रखें, ओर उसे चलाने का निरन्तर हवा में अकेले प्रयास करते रहें, ताकि विपत्ति के समय प्रयोग कर सकें ! जैसे-लाठी,हॉकी,गुप्ती, तलवार,भाला,त्रिशूल व बंदूक/पिस्तौल लाइसेंस के साथ !

संतान समानता के लिए:-

संकल्प लीजिए कि घर में पुत्र का जन्म हो या कन्या का, खुशी बराबरी से मनाएँ ! दोनों जरूरी है ! अगर बेटियाँ नहीं होगी तो परिवार व समाज को आगे बढाने वाली बहुएँ कहाँ से आएगी और बेटे नहीं होंगे तो परिवार समाज व देश की रक्षा कौन करेगा !

उक्त संकल्प सिद्धि प्राप्त करने हेतु हार्दिक शुभकामनाएं साभार मूल विचार स्त्रोत

कृपया स्व हित व राष्ट्र संस्कृति हित में अधिक से अधिक इस संकल्प सिद्धि को प्रचारित प्रसारित करें।

🔸संपर्क🔸

डा सुरेंद्र सिंह विरहे

मनोदैहिक आरोग्य आध्यात्मिक स्वास्थ्य विषेशज्ञ एवं लाईफ कोच, स्प्रिचुअल योगा थेरेपिस्ट

उप निदेशक

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी संस्कृति परिषद् भोपाल

शोध समन्वयक

धार्मिक न्यास धर्मस्व विभाग मध्य प्रदेश शासन

स्थापना सदस्य:

मध्य प्रदेश मैंटल हैल्थ एलाइंस चोइथराम हॉस्पिटल नर्सिंग कॉलेज इंदौर


निदेशक

दिव्य जीवन समाधान उत्कर्ष

Divine Life Solutions Utkarsh


पूर्व अध्येता

भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद् दिल्ली


"Philosophy of Mind And Consciousness Studies


utkarshfrom1998@gmail.com


9826042177,

8989832149




प्रेम की बेबसी

 प्रेम की तडपन प्रेम की बेबसी  कितना आसान है किसी पुरुष का एक स्त्री से प्रेम कर लेना, और कुछ वक्त साथ बिताकर उसे भूल भी जाना! पुरुष के लिए ...