Friday, August 9, 2024

दर्शनशास्त्र का लक्ष्य.. निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।

 दर्शनशास्त्र का लक्ष्य ..

निःश्रेयस की प्राप्ति है।

 परमलक्ष्य भौतिक भी हो सकता है, आध्यात्मिक भी। दर्शन केवल मार्ग दिशा बोध ही नहीं करता बल्कि मार्ग के औचित्य, कर्तव्य, शुभ ,अशुभ का भी दिशाबोध   कराता है । दर्शन कोई स्थिर वस्तु नहीं है। इसका स्वरूप गत्यात्मक है। इसकी व्यवहारिक उपयोगिता है। कार्ल मार्क्स ने द्वंदात्मक  भौतिकवाद द्वारा राजनीति के क्षेत्र में दर्शन की उपयोगिता सिद्ध कर दी। ऐतिहासिक क्रांतियां सदैव दार्शनिकों के विचारों से प्रेरित होती थी। स्वार्थ, विश्वास, संघर्ष, हिंसा, प्रतिकार इत्यादि से प्रकंपित विश्व को वसुधेव व कुटुंबकम का पाठ दर्शन ही पढ़ता है। विज्ञान की  खोजों का मानवता के हित में नियोजन की रूपरेखा दर्शन प्रस्तुत करता है ।शांति और अहिंसा का दर्शन नाभिकीय युद्ध से त्राण का ठोस उपाय बताता है । दर्शन ही विश्व में एक नैतिक एवं समतापूर्ण व्यवस्था की संरचना की ओर मानव को प्रेरित करता है। दर्शन का काम केवल संसार को जानना मात्र नहीं है वरन मार्क्स के शब्दों में दर्शन के सम्मुख मुख्य प्रश्न है कि उस संसार को कैसे परिवर्तित किया जाए ? इस तरह दर्शन की उपयोगिता मानव जीवन के प्रत्यक्ष क्षेत्र में दृष्टिगोचर होती है।

दर्शन की उत्पत्ति मानव मन में प्राकृतिक घटनाओं से उत्पन्न आश्चर्य, कोतूहल, आत्म अपूर्णता, बौद्धिक असंतोष इत्यादि कारणों से हुई । दर्शन के आरंभ से  अब तक का कल चार युगों में विभाजित किया जा सकता है प्राचीन काल, मध्यकाल, आधुनिक काल  एवं समकालीन युग  प्राचीन युग का प्रारंभ विश्व के प्रथम दार्शनिक थैलीज से हुआ, जिसने जल को ही जगत का मूल कारण कहा। कालांतर में

हेराकलेट्स ने अग्नि, 

डेमोक्राईट्स ने परमाणु को और पाईथोगोरस ने संख्या को मूल कारण बताया।


सुकारात ,प्लेटो एवं अरस्तू ने दर्शन को विकास के नए क्षितिज तक पहुंचाया इस युग में ज्ञान मीमांसा तत्व मीमांसा  एवं मूल्य मीमांसा की ठोस नीव पड़ गई ।

मध्य युगीन दर्शन एकिनास, अगस्टाइन, स्टोईकस, एरिजेना एवं विलियम् ऑफ ओकम जैसे संत दार्शनिकों के हाथों में विकसित हुआ। यद्यपि इनका चिंतन क्षेत्र धर्म की सीमा न लांघ सका। धार्मिक सुधारो, पुर्नजागरणों जैसे कारणों से बढ़ती हुई वैज्ञानिक खोज प्रवृत्ति से दर्शन में भी आमूल परिवर्तन हुए। देकार्ट ने बुद्धिमान की स्थापना की मध्य युगीन धार्मिक दार्शनिक चिंतन के प्रति विद्रोही स्वर मुखरित किया। स्पिनोजा एवं लाइव नित्यज ने बुद्धिवाद को आगे बढ़ाया। किंतु इसकी प्रतिक्रिया में अनुभव वाद का जन्म हुआ जिसके प्रतिनिधि विचारक लाक ,बर्कले एवं हुयूम हुए।


भारतीय दर्शन की भी अपनी विशिष्टता रही है ।भारत में दर्शन का आरंभ वेदों से होता है इसमें जगत का आदि तत्व कहा गया है ।उपनिषदों में भारतीय दर्शन का प्रारंभिक उत्कर्ष है। इसमें जगत, ब्रह्म, माया, आदि तत्वों का सूक्ष्म में विवेचन है कालांतर में सांख्य , जैन ,बौद्ध ,चार्वाक सहित  छह दर्शनों का अभ्युदय हुआ। भारतीय प्रगल्भ दार्शनिकों ने ज्ञान मीमांसा  एवं तत्व मीमांसा दोनों में अपनी गुढ़ बुद्धि का परिचय दिया। भारतीय दर्शन को चरमोत्कर्ष पर शंकराचार्य ने पहुंचाया। समकालीन दर्शन में अरविंद घोष एवं राधा कृष्णन ने उसे परंपरा को जीवित रखा है।


डा सुरेन्द्र सिंह विरहे 


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Surendra Singh Virhe 


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