Friday, August 9, 2024

दर्शन शास्त्र का महत्व प्राचीन काल से ही मान्य है!

 दर्शनशास्त्र का महत्व प्राचीन काल से ही मान्य रहा है!

ग्रीक  में फिलॉस्फर किंग एवं भारत में राज ऋषि का आदर्श सदैव अनुकरणीय  रहा है।


 प्रायः दार्शनिक राजा के सचिव पुरोहित सहायक एवं मार्गदर्शन हुआ करते थे भारतीय महाविद्यालय मूलत दर्शन शिक्षा के ही केंद्र थे दार्शनिक विचार सभ्यता एवं संस्कृति के प्राण तत्व होते हैं जिनकी आधारशिला पर समाज की संरचना होती है।

 नींव की सुदृढ़ता विशाल भवन का अपरिहार्य तत्व है अतः समाज का दार्शनिक पक्ष जितना समुन्नत होगा एवं समृद्ध होगा उसका भौतिक पक्ष उतना ही विकासशील एवं स्थाई होगा दूसरे शब्दों में मानव के आध्यात्मिक एवं भौतिक अर्थात सर्वांगीण विकास के लिए दर्शन की महत्वपूर्ण सार्थकता स्वतः सिद्ध होती है।


वास्तव में दर्शनशास्त्र यथार्थता का सूक्ष्म वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण से अध्ययन करने वाला शास्त्र है। दर्शनशास्त्र का क्षेत्र अध्यात्म वाद से भौतिकवाद तक विस्तृत हो गया है मूलत दर्शन शास्त्र के तीन विभाग है  तत्व मीमांसा, ज्ञान मीमांसा,  एवं मूल्य मीमांसा । 


तत्व  मीमांसा में ब्रह्मांड के मूल तत्व की विवेचना होती है जो विचारधारा इस मूल तत्व को भौतिक कहती है वह भौतिकवाद है जो इसे आध्यात्मिक मानती है वह आध्यात्मवाद  है। और जो इस मूल तत्व को एक मानने वाला मत एक तत्ववाद,दो मानने वाला द्वैतवाद एवं अनेक मानने वाला मत बहु तत्ववाद कहलाया।


तत्व मीमांसा में भौतिक एवं आध्यात्मिक तत्त्वों अर्थात पदार्थ एवं मन के संबंध, ईश्वर एवं आत्मा की सत्ता एवं संबंध आदि की विवेचना होती है ।

सत सृष्टि एवं श्रेष्ठ के स्वरूप संबंध एवं विकास की विवेचना भी तत्व मीमांसा में होती है जिससे  विकासवाद यंत्रवाद, प्रयोजनवाद आदि सिद्धांत प्रकट होते हैं।


ज्ञान मीमांसा में मानवीय ज्ञान के स्वरूप सीमा एवं सामर्थ्य की विवेचना की जाती है। जो सिद्धांत मानव ज्ञान का स्रोत इंद्रिय मात्र मानता है वह इंद्रिय अनुभववाद कहलाता है जबकि बुद्धि को ही ज्ञान का स्रोत मानने वाला मत बुद्धिवाद कहा गया है ।प्रथम मत के पोषक लॉक, बर्कले एवं ह्यूम है जबकि दूसरे मत का विकास डेकार्ट ,स्पिनोजा एवं लाइबनित्ज के मतों में हुआ है। कांत ने दोनों अतिवादी मतों की कमी का अन्वेषण करके समीक्षावाद का प्रणयन किया है जो ज्ञान के निर्माण में अनुभव एवं बुद्धि दोनों की महत्ता स्वीकार करता है।


मूल्य मीमांसा में दर्शन तर्कशास्त्र नीति शास्त्र एवं सौंदर्य शास्त्र की दृष्टि से मूल्यों की विवेचना करता है तथा सत्यम, शिवम, सुंदरम का निरूपण करता है इसके अतिरिक्त भी दर्शन की अनेक शाखाएं हैं जैसे की इतिहास का दर्शन धर्म का दर्शन शिक्षा समाजशास्त्र विज्ञान राजनीति अर्थशास्त्र इत्यादि का दर्शन इस तरह दर्शन अन्य विषयों से भी संबंध है।


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डा सुरेन्द्र सिंह विरहे 

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