Friday, February 7, 2025

प्रेम की बेबसी

 प्रेम की तडपन प्रेम की बेबसी 

कितना आसान है किसी पुरुष का एक स्त्री से प्रेम कर लेना, और कुछ वक्त साथ बिताकर उसे भूल भी जाना! पुरुष के लिए स्त्री एक खूबसूरत वस्तु जैसी होती है, जिसे पाने तक ही पुरुष सारा संघर्ष करता है, जी, जान लगाकर उस तक पहुंचने के दिन रात एक कर देता है!

कहा हो से लेकर क्या कर रही?? कितनी देर बाद ऑन लाइन आयी कहा थी अब तक..पुरुष तब तक स्त्री के पीछे भागता है ,जब तक उसे पा नहीं लेता, स्त्री उसे हासिल नहीं हो जाती, पुरुष के लिए स्त्री तभी तक सूरज, धरती, चांद, सितारा होती है,,जब तक वो उसे पा नहीं लेता.. और कहना...ताउम्र यू ही साथ रहूंगा..सारा प्रेम ही तभी तक है जब तक स्त्री की तरफ से स्वीकृति, प्रेम प्राप्त नहीं हो जाता! परंतु, जब स्त्री प्रेम की स्वीकृति देती है! प्रेम को स्वीकार करती है, उस दिन से उसके अंदर एक बीज पनपता है, और वो प्रेम का बीज बढ़ता ही जाता है, धीरे धीरे वो बीज एक पौधे से मजबूत जड़ के साथ बड़ा पेड़ बन जाता है!

फिर इस प्रेम के पेड़ को उस स्त्री के अंदर से निकालना असंभव हो जाता है! और वो स्त्री इसी बढ़ते प्रेम के पेड़ में स्वयं नष्ट होने के कगार पर आ खड़ी होती है! और पुरुष, जिसे वो स्त्री प्रेम स्वीकृति के पहले, सूरज चांद सितारा लगती थी, अब कांटा लगने लगती है, क्योंकि पुरुष उस कुसुम सौंदर्य को प्राप्त कर चुका होता है, पुरुष के भीतर का प्रेम धीरे धीरे समाप्त होने लगता है! फिर पुरुष उस स्त्री से भागने लगता है, उससे दूरी बनाने लगता है, जिस स्त्री को पाने के लिए, बात करने पुरुष रात दिन ठंडी गर्मी नहीं देखता था, अब पुरुष का दिल उस स्त्री से भरने के बाद कहता है, मै बहुत बिजी हूं मेरे पास वक्त नहीं है, समय नहीं मिलामैसेज देखने का,और

उसी समय कही और वही बाते कर रहा..फिर पुरुष अपने प्रेम के लिए दूसरी औरत की तलाश में लग जाता है, इधर स्त्री पुरुष में प्रेम ढूढते ढूढते टूटती जाती है! जीवन का सारा सुख चैन गंवा देती है, अंत में आंखों में आंसुओ की धारा के साथ जीना सीख जाती है, ये एक स्त्री की पीड़ा है, जिसे कुछ पुरुष अपनी सोच के अनुसार सिर्फ गलत कहेंगे,.

प्रेम है ये किसी को उम्र भर की तकलीफ देकर खुद कही और खुदा बनाते है.. अरे क्यों करते शादी सुदा स्त्री से प्रेम.. और वो पागल बन जाती जाने क्यों तलाश करती बाहरी दुनियां मे प्रेम.... 

Tuesday, February 4, 2025

अपामार्ग (लटजीरा) एक जड़ी-बूटी है, और इसके कई औषधीय गुण

 🔹#अपामार्ग को चिरचिटा, लटजीरा, चिरचिरा, चिचड़ा भी बोलते हैं। यह एक बहुत ही साधारण पौधा है। आपने अपने घर के आस-पास, जंगल-झाड़ या अन्य स्थानों पर अपामार्ग का पौधा जरूर देखा होगा, लेकिन शायद इसे नाम से नहीं जानते होंगे। अपामार्ग की पहचान नहीं होने के कारण प्रायः लोग इसे बेकार ही समझते हैं, लेकिन आपका सोचना सही नहीं है। अपामार्ग (लटजीरा) एक जड़ी-बूटी है, और इसके कई औषधीय गुण हैं। कई रोगों के इलाज में अपामार्ग (चिरचिटा) के इस्तेमाल से फायदे मिलते हैं। दांतों के रोग, घाव, पाचनतंत्र विकार सहित अनेक बीमारियों में अपामार्ग के औषधीय गुण से लाभ मिलता है।

      अपामार्ग की मुख्यतः दो प्रजातियां होती हैं, जिनका प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है।

●सफेद अपामार्ग

●लाल अपामार्ग 


★सफेद अपामार्ग (चिरचिरा) के फायदे और उपयोग:-

अपामार्ग (लटजीरा) का औषधीय प्रयोग, प्रयोग की मात्रा और विधियां ये हैंः-

●दांत के दर्द में अपामार्ग (चिरचिरा) के फायदे:

अपामार्ग के 2-3 पत्तों के रस में रूई को डुबाकर फोया बना लें। इसे दांतों में लगाने से दांत का दर्द ठीक होता है।

        अपामार्ग की ताजी जड़ से रोजाना दातून करने से दांत के दर्द तो ठीक होते ही हैं, साथ ही दाँतों का हिलना, मसूड़ों की कमजोरी, और मुंह से बदबू आने की परेशानी भी ठीक होती है। इससे दांत अच्छी तरह साफ हो जाते हैं।  

●चर्म रोग में अपामार्ग (चिरचिरा) के औषधीय गुण से फायदा:

चर्म रोग में अपामार्ग (लटजीरा) से औषधीय गुण से लाभ मिलता है। इसके पत्तों को पीसकर लगाने से फोड़े-फुन्सी आदि चर्म रोग और गांठ के रोग ठीक होते हैं।

●मुंह के छाले में अपामार्ग (चिरचिरा) के फायदे:

मुंह में छाले होने पर अपामार्ग (लटजीरा) के गुण फायदेमंद होते हैं। इसके लिए अपामार्ग के पत्तों का काढ़ा बनाकर गरारा करें। इससे मुंह के छाले की परेशानी ठीक होती है।

●बहुत अधिक भूख लगने की बीमारी को भस्मक रोग कहते हैं। इसके उपचार के लिए अपामार्ग के बीजों के 3 ग्राम चूर्ण दिन में दो बार लगभग एक सप्ताह तक सेवन करें। इससे अत्यधित भूख लगने की समस्या ठीक होती है।

       अपामार्ग के 5-10 ग्राम बीजों को पीसकर खीर बना लें। इसे खाने से अधिक भूख लगने की समस्या ठीक होती है।

       अपामार्ग के बीजों को खाने से भी अधिक भूख नहीं लगती है।

       अपामार्ग (लटजीरा) के बीजों को कूटकर महीन चूर्ण बना लें। इसमें बराबर मात्रा में मिश्री मिलाएं। इसे 3-6 ग्राम तक सुबह-शाम जल के साथ सेवन करें। इससे भी लाभ होता है।

●2 ग्राम अपामार्ग की जड़ के रस में 2 चम्मच मधु मिलाएं। इसे 2-2 बूंद आंख में डालने से आंखों के रोग ठीक होते हैं।

आईफ्लू, आंखों के दर्द, आंख से पानी बहने, आंखें लाल होने, और रतौंधी आदि में अपामार्ग का इस्तेमाल करना उत्तम परिणाम देता है। अपामार्ग की जड़ को साफ कर लें। इसमें थोड़ा सेंधा नमक मिलाकर दही के पानी के साथ तांबे के बर्तन में घिसें। इसे काजल की तरह लगाने से आंखों के रोग में लाभ होता है।

●अपामार्ग के 2-3 पत्तों को हाथ से मसलकर रस निकाल लें। इस रस को कटने या छिलने वाले स्थान पर लगाएं। इससे खून बहना रुक जाता है।

     अपामार्ग की जड़ को तिल के तेल में पकाकर छान लें। इसे कटने या छिलने वाले जगह पर लगाएं। इससे आराम मिलता है।

●पुराने घाव हो गया हो तो अपामार्ग के रस के मलहम लगाएं। इससे घाव पकता नहीं है।

अपामार्ग (लटजीरा) की जड़ को तिल के तेल में पकाकर छान लें। इसे घाव पर लगाएं। इससे घाव का दर्द कम हो जाता है। इससे घाव ठीक भी हो जाता है।

लगभग 50 ग्राम अपामार्ग के बीज में चौथाई भाग मधु मिला लें। इसे 50 ग्राम घी में अच्छी तरह पका लें। पकाने के बाद ठंडा करके घाव पर लेप करें। इससे घाव तुरंत ठीक हो जाता है।

जड़ का काढ़ा बनाकर घाव को धोने से भी घाव ठीक होता है।

●अपामार्ग (लटजीरा) पंचांग से काढ़ा बना लें। इसे जल में मिलाकर स्नान करने पर खुजली ठीक हो जाती है। उपाय करने से पहले किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक से जरूर मिलें।

●दमा के इलाज के लिए अपामार्ग की जड़ चमत्कारिक रूप से काम करती है। इसके 8-10 सूखे पत्तों को हुक्के में रखकर पीने से श्वसनतंत्र संबंधित विकारों में लाभ होता है।

●लगभग 125 मिग्रा अपामार्ग क्षार में मधु मिलाएं। इसे सुबह और शाम चटाने से बच्चों की श्वास नली और छाती में जमा कफ निकल जाता है। बच्चों की खांसी ठीक होती है। खांसी बार-बार परेशान करती है, और कफ नहीं निकल रहा है या फिर कफ गाढ़ा हो गया है तो अपामार्ग के सेवन से लाभ मिलता है। इस बीमारी में या न्यूमोनिया होने पर 125-250 मिग्रा अपामार्ग क्षार और 125-250 मिग्रा चीनी को 50 मिली गुनगुने जल में मिला लें। इसे सुबह-शाम सेवन करने से 7 दिन में लाभ हो जाता है।

     6 मिली अपामार्ग की जड़ का चूर्ण बना लें। इसमें 7 काली मिर्च के चूर्ण को मिलाएं। सुबह-शाम ताजे जल के साथ सेवन करने से खांसी में लाभ होता है।

     अपामार्ग (लटजीरा) पंचांग का भस्म बनाएं। 500 मिग्रा भस्म में शहद मिलाकर सेवन करने से कुक्कुर खांसी ठीक होती है।

     बलगम वाली खासी को ठीक करने के लिए अपामार्ग की जड़ चमत्कारिक रूप से काम करती है। इसके 8-10 सूखे पत्तों को हुक्के में रखकर पीने से खांसी ठीक हो जाती है।

●अपामार्ग (लटजीरा) के 10-20 पत्ते लें। इन्हें 5-10 नग काली मिर्च और 5-10 ग्राम लहसुन के साथ पीसकर 5 गोली बना लें। बुखार आने से दो घंटे पहले 1-1 गोली लेने से ठंड लगकर आने वाला बुखार खत्म होता है।

●2-3 ग्राम अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को दिन में 2-3 बार ठंडे जल के साथ सेवन करें। इससे हैजा ठीक होता है।

अपामार्ग के 4-5 पत्तों का रस निकालें। इसमें थोड़ा जल व मिश्री मिलाकर प्रयोग करने से भी हैजा में लाभ मिलता है।

●20 ग्राम अपामार्ग पंचांग को 400 मिली पानी में मिलाकर आग पर पकाएं। जब पानी एक चौथाई रह जाए तब 500 मिग्रा नौसादर चूर्ण और 1 ग्राम काली मिर्च चूर्ण मिला लें। इसे  दिन में 3 बार सेवन करने से पेट के दर्द में राहत मिलती है। इससे पेट की अन्य बीमारी भी ठीक हो जाती है।

     2 ग्राम अपामार्ग (चिरचिरा) की जड़ के चूर्ण में शहद मिलाकर सेवन करने से पेट के दर्द ठीक होते हैं।

●अपामार्ग की 6 पत्तियों और 5 नग काली मिर्च को जल के साथ पीस लें। इसे छानकर सुबह और शाम सेवन करने से बवासीर में लाभ हो जाता है। इससे खून बहना रुक जाता है।

अपामार्ग के बीजों को कूट-छानकर महीन चूर्ण बना लें। इसमें बराबर मात्रा में मिश्री मिलाएं। इसे 3-6 ग्राम तक सुबह-शाम जल के साथ सेवन करें। इससे बवासीर में फायदा होता है।

10-20 ग्राम अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को चावल के धोवन के साथ पीस-छान लें। इसमें दो चम्मच शहद मिलाकर पिलाने से पित्तज या कफज विकारों के कारण होने वाले खूनी बवासीर की बीमारी में लाभ होता है।

●अपामार्ग की 5-10 ग्राम ताजी जड़ को पानी में पीस लें। इसे घोलकर पिलाने से पथरी की बीमारी में बहुत लाभ होता है। यह औषधि किडनी की पथरी को टुकडे-टुकड़े करके शरीर से बाहर निकाल देती है। किडनी में दर्द के लिए यह औषधि बहुत काम करती है।

●रसौली के इलाज में अपामार्ग के फायदे होते हैं। अपामार्ग के लगभग 10 ग्राम ताजे पत्ते एवं 5 ग्राम हरी दूब को पीस लें। इसे 60 मिली जल में मिलाकर छान लें। इसे गाय के 20 मिली दूध में मिलाकर पिलाएँ। इसमें इच्छानुसार मिश्री मिलाकर सुबह सात दिन तक पिलाएं। यह प्रयोग रोग ठीक होने तक नियमित रूप से करें। इससे गर्भाशय में गांठ (रसौली) की बीमारी ठीक हो जाती है।

●सज्जीक्षार, सेंधा नमक, चित्रक, दंती, भूम्यामलकी की जड़, श्वेतार्क लें। इसके साथ ही अपामार्ग (चिरचिरा) बीज का पेस्ट और गोमूत्र लें। इसे तेल में पकाएँ। इसका लेप करने से साइनस जल्द ठीक हो जाता है।

●भोजन उचित तरह से नहीं पचने के कारण भी वजन बढ़ता है। अपामार्ग में दीपन-पाचन गुण होता है। यह भोजन को पचाने में मदद करता है। इससे शरीर के वजन को कम करने में मदद मिलती है। 


★लाल अपामार्ग (चिरचिरा) के फायदे और उपयोग:


◆भूख बढ़ाने में लाल अपामार्ग (चिरचिरा) के औषधीय गुण फायदेमंद होते हैं। लाल अपामार्ग की जड़ या पंचांग का काढ़ा बना लें। 10-30 मिली मात्रा में काढ़ा का सेवन करें। इससे भूख बढ़ती है।  

●1-2 ग्राम अपामार्ग (चिरचिरा) के तने और पत्ते के चूर्ण का सेवन करने से कब्ज की बीमारी ठीक होती है। उपाय करने से पहले किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक से जरूर सलाह लें।

●लाल अपामार्ग के पत्ते से बने 10-30 मिली काढ़ा में चीनी मिला लें। इसका सेवन करने से मूत्र रोग जैसे पेशाब में दर्द होना और पेशाब का रुक-रुक कर आने की परेशानी ठीक होती है।

●लाल अपामार्ग की जड़ या पंचांग का काढ़ा बना लें। इसे 10-30 मिली मात्रा में सेवन करने से पेचिश और हैजा रोग में लाभ होता है।

★ अपामार्ग का इस्तेमाल की सही मात्रा :-

रस- 10-20 मिली

जड़ का चूर्ण- 3-6 ग्राम

बीज- 3 ग्राम

क्षार- 1/2-2 ग्राम

   नोट-    अपामार्ग अर्थात चिरचिरा के उपयोग की समस्त जानकारी विभिन्न स्रोतों से ली गयी है, उपयोग से पूर्व किसी जानकार वैद्य/डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें। 

   धन्यवाद!

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🔹 महिलाओं की सभी समस्याओं का समाधान है ये अकेला पौधा *खाली पेट 20-30ml पंचांग का स्वरस पीने से लगभग सभी प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं या पांच ग्राम पंचांग चूर्ण या दस ग्राम पंचांग का काढ़ा उबालकर छानकर पिएं 

एक औषधीय वनस्पति है। इसका वैज्ञानिक नाम 'अचिरांथिस अस्पेरा' (ACHYRANTHES ASPERA) है। हिन्दी में इसे 'चिरचिटा', 'लटजीरा', 'चिरचिरा ' आदि नामों से जाना जाता है।इसे लहचिचरा भी कहा जाता है।

सफेद और लाल दोनों प्रकार के अपामार्ग की मंजरियां पत्तों के डण्ठलों के बीच से निकलती हैं। ये लंबे, कर्कश, कंटीली-सी होती है। इनमें ही सूक्ष्म और कांटे-युक्त बीज होते हैं। ये बीज हल्के काले रंग के छोटे चावल के दाने जैसे होते हैं। ये स्वाद में कुछ तीखे होते हैं। इसके फूल छोटे, कुछ लाल हरे या बैंगनी रंग के होते हैं। लाल अपामार्ग की डण्डियां और मञ्जरियां कुछ लाल रंग की होती हैं। इसके पत्तों पर लाल-लाल सूक्ष्म दाग होते हैं।  

ये एक गज़ब का डाइयुरेटिक और डिटाक्सीफायर है

आप इसके इस्तेमाल से 1 महीने के भीतर ही अपना वज़न कम कर सकते हैं। अपामार्ग के पत्ते आपके शरीर से ज़हरीले पदार्थो को बाहर निकालते हैं और आपके शरीर के अन्दर फ़ालतू पानी को भी बाहर निकालते हैं। किडनी तथा लिंफेटिक सिस्टम की विषाक्तता को डिटॉक्स करने के लिए अपामार्ग जबरदस्त औषधि है 


 इसका उपयोग करने से आपका पेट भरा भरा हुआ सा लगता हैं, जिससे आपको भूख नहीं लगती हैं और आपका वज़न बहुत ही जल्दी कम होने लगता हैं। इसके सेवन से आपको बार-बार पेशाब लगने लगता हैं, लेकिन आपको घबराने की जरूरत नहीं हैं। पेशाब के जरिये यह आपके शरीर के अंदरूनी सफाई करके विषैले टोक्सिन्स को बाहर निकालता हैं


पुरूषों के लिए भी ये महा गुणकारी है अपामार्ग चूर्ण 8 ग्राम पानी में पीसकर छानकर 5 ग्राम शहद और 250 मिली दूध के साथ पीने से शीघ्रपतन नहीं होता है

अपामार्ग के 5-8 ग्राम बीजों का चूर्ण बराबर मिश्री के साथ दिन में दो बार खाने से जो बार बार भूख लगती है वो शांत हो जाती है यानी भस्मिक रोग शांत हो जाता है 


इसके बीजों की खीर बनाकर खाने से कई दिन तक भूख नहीं लगती और शरीर कमजोर नहीं होता है। साथ ही मोटापा दूर करने में मददगार होता है।

इसमें लिपोमा और अन्य गांठों को पिघलाने के भी जबरदस्त गुण पाए जाते हैं 

लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में अपामार्ग क्षार, सज्जी क्षार और  जवाक्षार को लेकर पानी में पीसकर सूजन वाली गांठ पर लेप की तरह सेलगाने से सूजन दूर हो जाती है।

इस के रस में रूई को डुबाकर दांतों में लगाने से दांतों का दर्द कम होता है।

इसकी ताजी जड़ से दातून करने से भी दांतों का दर्द ठीक होता है। साथ ही दांतों की सफाई दातों का हिलना, मसूड़ों की कमजोरी और मुंह की बदबू भी दूर होती है।

 

अपामार्ग के पंचांग का काढ़ा लगभग 14 से 28 मिलीलीटर दिन में 3 बार सेवन करने से कुष्ठ (कोढ़) रोग ठीक हो जाता है।


 अपामार्ग का चूर्ण लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग की

मात्रा में लेकर पीने से जलोदर (पेट में पानी भरना) की सूजन कम होकर समाप्त हो जाती है।

अपामार्ग की 5-10 ग्राम ताजी जड़ को पानी में पीस लें। इसे घोलकर पिलाने से पथरी की बीमारी में बहुत लाभ होता है। यह औषधि किडनी की पथरी को टुकडे-टुकड़े करके शरीर से बाहर निकाल देती है। किडनी में दर्द के लिए यह औषधि बहुत काम करती है।


*महिलाओं के लिए वरदान है अपामार्ग *

अपामार्ग  पंचांग के रस में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करने से मासिक धर्म विकार ठीक होता है।

अपामार्ग की जड़ के रस से रूई को भिगोएं। इसे योनि में रखने से मासिक धर्म की रुकावट खत्म होती है।

अपामार्ग के लगभग 10 ग्राम ताजे पत्ते और 5 ग्राम हरी दूब को पीस लें। इसे 60 मिली जल में मिलाकर छान लें। अब इसे गाय के दूध में मिला लें। इसमें ही 20 मिली या इच्छानुसार मिश्री मिलाकर सुबह सात दिन तक पिलाने से  मासिक धर्म के दौरान अधिक खून बहने की परेशानी में लाभ होता है। इसे रोग ठीक होने तक नियमित रूप से करें।

अपामार्ग पंचांग के रस में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करने से मासिक धर्म के दौरान अधिक रक्तस्राव की समस्या ठीक होती है।

सिस्ट और फाइब्रॉयड के इलाज में अपामार्ग के जबरदस्त फायदे होते हैं। अपामार्ग के लगभग 10 ग्राम ताजे पत्ते एवं 5 ग्राम हरी दूब को पीस लें। इसे 60 मिली जल में मिलाकर छान लें। इसे गाय के 20 मिली दूध में मिलाकर पिलाएँ। इसमें इच्छानुसार मिश्री मिलाकर सुबह सात दिन तक पिलाएं। यह प्रयोग रोग ठीक होने तक नियमित रूप से करें। इससे गर्भाशय में गांठ (सिस्ट फाइब्रॉयड  ) की बीमारी ठीक हो जाती है।

 ल्यूकोरिया का इलाज करने के लिए अपामार्ग का प्रमुखता से इस्तेमाल करते हैं। अपामार्ग पंचांग के रस में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करने से ल्यूकोरिया ठीक होता है।


इसके अलावा इसके तंत्र में भी बहुत महत्वपूर्ण प्रयोग हैं 

प्रसव पीड़ा प्रारम्भ होने से पहले अपामार्ग के जड़ को एक धागे में बांधकर कमर में बांधने से प्रसव सुखपूर्वक होता है, परंतु प्रसव होते ही उसे तुरंत हटा लेना चाहिए। 


इसे वज्र दन्ती भी कहते हैं। इसकी जड़ से दातून करने से दांतों की जड़ें मजबूत और दाँत मोती की तरह चमकते हैं। पायरिया मसूड़ों दांतों की कमजोरियां और सड़न हटाने में चमत्कारिक रूप से प्रभावी है

Wednesday, December 18, 2024

 स्वस्थ भारत निर्माण संकल्प से विकसित आत्मनिर्भर दिव्य भव्य भारत की बुनियाद बनें।

आइए हम सब आगामी नव वर्ष की शुरुआत पर भारत को स्वस्थ और खुशहाल बनाने का संकल्प लें। 

भारत के स्वास्थ्य विषयक आंकड़े चिंताजनक है खासतौर पर मानसिक स्वास्थ्य के आंकड़े अत्यंत गंभीर व चिंताजनक है ।

स्वास्थ्य में सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाने के लिए जन गण मन में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता स्वस्थ  रहने हेतु प्रेरित करने की नितांत आवश्यकता है।


आज की बेहद व्यस्त जीवनशैली में कई स्वास्थ्य समस्याएं मानसिक और शारीरिक तनाव का कारण बनती हैं। उच्च रक्तचाप, मोटापा, मधुमेह जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ और अवसाद जैसे मानसिक विकार काफी बढ़ रहे हैं।

नियमित स्वास्थ्य मूल्यांकन के साथ, इन्हें प्रभावी ढंग से नियंत्रित करना और बाद में शारीरिक, मानसिक और सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय तनाव से बचाना आसान होता है।

भारत में स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे

WHO के आँकड़ों के अनुसार:

देश में अनुमानत: 150 मिलियन लोगों को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की आवश्यकता है।

60 वर्ष से कम आयु के पुरुषों में गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के कारण मृत्यु 38.0% है

60 वर्ष से कम आयु की महिलाओं में एनसीडी के कारण मृत्यु दर 32.1% है

कैंसर, दीर्घकालिक श्वसन रोग, हृदय रोग, मधुमेह आदि जैसे एनसीडी के लिए मृत्यु दर पुरुषों में प्रति 100,000 पर 781.7 और महिलाओं में 571.0 प्रति 100,000 है।


क्योंकि नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, लगभग 80% मौतें एनसीडी (गैर-संचारी रोग) के कारण होती हैं और भारत में विश्व स्तर पर मधुमेह रोगियों की संख्या सबसे अधिक है।

भारत स्वस्थ और खुशहाल कैसे होगा?

भारत के स्वास्थ्य में सुधार के लिए कुछ कदम हैं:

रोकथाम स्वास्थ्य जांच अप्रत्याशित स्वास्थ्य देखभाल खर्चों से बचने का सबसे आसान तरीका है

समय पर टीकाकरण

स्वस्थ जीवनशैली और स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के बुनियादी मानकों को बनाए रखना

भारतीय अर्थव्यवस्था की तीव्र गति के परिणामस्वरूप काम के लंबे घंटों के कारण तनाव, शारीरिक व्यायाम की कमी, अधिकतम नींद और अस्वास्थ्यकर खान-पान की आदतों के कारण जीवनशैली संबंधी स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हुई हैं। ऐसे में योग और ध्यान अद्भुत काम करते हैं।


संगठनों को आवश्यक स्वास्थ्य और कल्याण पहल को प्राथमिकता के आधार पर समझना और लेना चाहिए और एक स्वस्थ कार्य संस्कृति के लिए प्रयास करना चाहिए।


आज के इस भागमभाग भोगवादी उपभोक्ता बाजारवादी कुसंस्कृति के इस दौर में मानसिक स्वास्थ्य के बिगड़ने के लक्षणों पर ध्यान केंद्रित करना अत्यन्त आवश्यक है, जैसे कि तनाव, अवसाद, नींद की कमी, अनावश्यक चिंता, रुचि की हानि और आत्मविश्वास में कमी।


दिव्य जीवन समाधान उत्कर्ष संस्थान स्वस्थ भारत मिशन में विगत दो दशक से सक्रिय भूमिका निभा रहा है इसके साथ ही, यह मनोदैहिक आरोग्य अभियान में अग्रणी भूमिका में है यह अभियान स्वस्थ भारत समर्थन और जागरूकता बढ़ाने का उद्देश्य रखता है।


मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियों के प्रति जागरूक बनें निम्न लिखित लक्षणों के प्रति सचेत रहें:

रात को अच्छी नींद ना आना।

दिनभर अनावश्यक विचार चलते रहना।

बेवजह की चिंता और घबराहट महसूस होना।

मन का उदास रहना

आत्मविश्वास में लगातार गिरावट महसूस करना।

किसी भी काम में मन ना लगना। और छोटे-छोटे काम को कल पर टालना।

हमेशा नकारात्मक पहलू नजर आना।

अच्छा खाना खाने के बावजूद लगातार वजन का कम होना।

अपने पसंदीदा कामों और रतिक्रिया में रुचि खो देना।

अत्यंत छोटी-छोटी बातों पर बहुत गुस्सा करना और झुंझलाहट महसूस होना


स्वास्थ्य परामर्श ,रोग निदान  समस्या समाधान हेतु संपर्क करें:

डा सुरेंद्र सिंह विरहे

मनोदैहिक आरोग्य विशेषज्ञ 

आध्यात्मिक योग थेरेपिस्ट लाईफ कोच


09826042177

08989832149


https://youtube.com/@divine177

Wednesday, September 11, 2024

कुण्डलिनी जागरण !! सप्त चक्र , सप्त चक्र भेदन !!! आत्म साक्षात्कार की प्राप्ति !!!!

 कुंडलिनी शक्ति!

कुण्डलिनी जागरण !!

सप्त चक्र , सप्त चक्र भेदन !!!

आत्म साक्षात्कार की प्राप्ति !!!!


कुण्डलिनी शक्ति

कुंडलिनी शक्ति भारतीय योग और तंत्र परंपरा में आध्यात्मिक ऊर्जा का एक रूप है, जिसे हमारे शरीर के अंदर सोई हुई शक्ति के रूप में माना जाता है। यह शक्ति "सर्पिणी" के रूप में रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में स्थित होती है, जिसे "मूलाधार चक्र" कहा जाता है। कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने से व्यक्ति गहरे आध्यात्मिक अनुभव और आत्म-साक्षात्कार की स्थिति में प्रवेश कर सकता है।


कुण्डलिनी जागरण कैसे होता है?

कुंडलिनी जागरण कई आध्यात्मिक प्रथाओं के माध्यम से किया जा सकता है। इनमें योग, प्राणायाम, ध्यान, मंत्र जप, और गुरु कृपा शामिल हैं। कुंडलिनी जागरण का मुख्य उद्देश्य चेतना को उच्च चक्रों तक उठाना है, जो आत्म-साक्षात्कार और आध्यात्मिक विकास की ओर ले जाता है।


कुंडलिनी जागरण के मुख्य उपाय:


योगासन: 

कुछ विशेष आसनों जैसे कि भुजंगासन, पद्मासन, शलभासन कुंडलिनी जागरण में सहायक होते हैं।


प्राणायाम: 

ब्रीदिंग तकनीक जैसे कि कपालभाति, अनुलोम-विलोम और भस्त्रिका कुंडलिनी को जागृत करने में मदद करते हैं।


ध्यान: 

ध्यान के माध्यम से मन को शुद्ध कर व्यक्ति अपनी आंतरिक ऊर्जा को महसूस कर सकता है।


मंत्र जप: "ॐ" या अन्य विशेष मंत्रों का जप करके कुंडलिनी शक्ति को उत्तेजित किया जा सकता है।


गुरु कृपा:

एक योग्य गुरु की कृपा से भी कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया संभव हो सकती है।


सप्त चक्र क्या हैं?

कुंडलिनी योग में शरीर के अंदर सात मुख्य ऊर्जा केंद्र माने जाते हैं, जिन्हें सप्त चक्र कहा जाता है। ये चक्र कुंडलिनी के जागरण के दौरान मुख्य भूमिका निभाते हैं। 

ये सात चक्र निम्नलिखित हैं:


मूलाधार चक्र:

यह चक्र रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले हिस्से में स्थित होता है और धरती तत्व से जुड़ा होता है।


स्वाधिष्ठान चक्र: 

यह नाभि के पास स्थित होता है और जल तत्व से संबंधित होता है।


मणिपुर चक्र: 

यह पेट के ऊपरी भाग में स्थित होता है और अग्नि तत्व से जुड़ा होता है।


अनाहत चक्र: 

यह हृदय के पास स्थित होता है और वायु तत्व से संबंधित होता है।


विशुद्धि चक्र: 

यह गले में स्थित होता है और आकाश तत्व से संबंधित होता है।


आज्ञा चक्र:

यह माथे के बीचों-बीच स्थित होता है और इसका संबंध अंतर्ज्ञान और मानसिक शक्ति से होता है।


सहस्रार चक्र: 

यह सिर के ऊपर स्थित होता है और यह आध्यात्मिकता का उच्चतम स्तर माना जाता है।


सप्त चक्र भेदन कैसे होता है?

सप्त चक्र भेदन का अर्थ है कुंडलिनी शक्ति को मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक उठाना। इसके लिए कई प्रथाएँ हैं, जिनमें ध्यान, प्राणायाम, आसन, और बंधों (शरीर के अंगों की कसावट) का अभ्यास शामिल है। प्रत्येक चक्र को जागृत करने के लिए कुछ विशेष ध्यान, मुद्राएं और मंत्र होते हैं। जैसे-जैसे कुंडलिनी ऊंचे चक्रों की ओर बढ़ती है, व्यक्ति गहरे आध्यात्मिक अनुभव और आत्म-जागृति की अवस्था में प्रवेश करता है।


आत्म-साक्षात्कार कैसे प्राप्त होता है?

आत्म-साक्षात्कार का अर्थ है स्वयं की सच्ची प्रकृति को जानना और अपने भीतर के दिव्य स्वरूप का अनुभव करना। इसे प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित प्रथाओं का पालन किया जाता है:


स्वयं का अवलोकन: 

ध्यान के माध्यम से व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और इच्छाओं को देखता है और उनसे अलग हो जाता है।


वैराग्य और भक्ति: 

सांसारिक इच्छाओं से वैराग्य और ईश्वर के प्रति भक्ति आत्म-साक्षात्कार की दिशा में मार्ग प्रशस्त करते हैं।


योग और साधना: 

योगासन, प्राणायाम, और ध्यान की नियमित साधना आत्मा की गहराइयों को समझने में मदद करती है।


गुरु मार्गदर्शन: एक योग्य गुरु की सहायता आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

ज्ञान योग: इस मार्ग में व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप का बोध प्राप्त करने के लिए वेदांत और शास्त्रों का अध्ययन करता है।

आत्म-साक्षात्कार का अंतिम लक्ष्य यह है कि व्यक्ति को अपनी दिव्यता और विश्व-ब्रह्मांड के साथ अपनी एकता का अनुभव हो, जिससे जीवन का उद्देश्य पूर्णता की ओर अग्रसर हो जाता है।

Friday, September 6, 2024

कुंडलिनी जागरण के शारीरिक मानसिक आध्यात्मिक स्वास्थ्य लाभ

 कुंडलिनी शक्ति जागरण !

कुंडलिनी जागरण के शारीरिक मानसिक आध्यात्मिक स्वास्थ्य लाभ 


कुंडलिनी शक्ति जागरण एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जो योग और ध्यान के माध्यम से की जाती है। कुंडलिनी ऊर्जा को शरीर में एक सुप्त अवस्था में माना जाता है, जो हमारी रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में, मूलाधार चक्र में स्थित होती है। जब यह शक्ति जागृत होती है, तो यह एक सर्प की तरह ऊपर की ओर चढ़ती है और शरीर के सात मुख्य चक्रों (ऊर्जा केंद्रों) से गुजरती है। कुंडलिनी जागरण का मुख्य उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार और उच्चतर चेतना प्राप्त करना है।


कुंडलिनी जागरण के शारीरिक, मानसिक, और आध्यात्मिक लाभ:

1. शारीरिक लाभ:

ऊर्जा का संचार: कुंडलिनी जागरण से शरीर में प्रचुर मात्रा में ऊर्जा का संचार होता है, जिससे थकान, सुस्ती, और आलस्य कम होता है।


स्वास्थ्य में सुधार: कुंडलिनी जागरण के साथ शरीर का संतुलन और ऊर्जा का प्रवाह सही हो जाता है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और स्वास्थ्य में सुधार होता है।


मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र का सशक्तिकरण: कुंडलिनी जागरण से मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को सशक्त बनाया जा सकता है, जिससे स्मरण शक्ति और एकाग्रता बढ़ती है।

आंतरिक अंगों का पुनर्निर्माण: कुंडलिनी ऊर्जा शरीर के आंतरिक अंगों और प्रणालियों को सशक्त बनाती है, जिससे पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र और हृदय प्रणाली को मजबूती मिलती है।


2. मानसिक लाभ:

मानसिक स्पष्टता: कुंडलिनी जागरण से मानसिक स्पष्टता आती है, जिससे व्यक्ति जटिल विचारों को सुलझा सकता है और विचारों में एकाग्रता आती है।


तनाव और चिंता से मुक्ति: कुंडलिनी जागरण के दौरान ध्यान और योग से मानसिक शांति और स्थिरता मिलती है, जिससे तनाव और चिंता दूर होती है।


भावनात्मक संतुलन: कुंडलिनी जागरण से व्यक्ति की भावनाओं पर नियंत्रण बढ़ता है, जिससे क्रोध, दुःख, और असंतोष जैसी नकारात्मक भावनाओं का नाश होता है और भावनात्मक संतुलन प्राप्त होता है।


रचनात्मकता का विकास: कुंडलिनी जागरण से मस्तिष्क के रचनात्मक हिस्से को सक्रिय किया जा सकता है, जिससे व्यक्ति में नवाचार और कला की भावना का विकास होता है।


3. आध्यात्मिक लाभ:

आत्म-साक्षात्कार: कुंडलिनी जागरण का सबसे प्रमुख लाभ आत्म-साक्षात्कार है, जहाँ व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है और "मैं" की भावना से ऊपर उठता है।

चेतना का विस्तार: जागृत कुंडलिनी से व्यक्ति की चेतना उच्चतर स्तर पर पहुँचती है, जिससे वह ब्रह्मांडीय ज्ञान, सत्य, और आध्यात्मिक अनुभवों का अनुभव करता है।


आध्यात्मिक मार्गदर्शन: कुंडलिनी जागरण से व्यक्ति को अदृश्य मार्गदर्शकों और ऊर्जा की उपस्थिति का अनुभव हो सकता है, जो उसे आत्मिक विकास की दिशा में प्रेरित करती है।


सात चक्रों का शुद्धिकरण: कुंडलिनी जागरण के दौरान शरीर के सात चक्रों को जागृत और शुद्ध किया जाता है, जिससे व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त होता है।


सहज ज्ञान: कुंडलिनी जागरण से व्यक्ति के भीतर सहज ज्ञान और अंतर्ज्ञान का विकास होता है, जिससे उसे जीवन के विभिन्न पहलुओं में गहरी समझ प्राप्त होती है।

कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया:


योग और प्राणायाम: कुंडलिनी जागरण में प्रमुख रूप से योग और प्राणायाम का अभ्यास किया जाता है। खासकर "कपालभाति", "भस्त्रिका", और "नाड़ी शोधन" जैसे प्राणायाम कुंडलिनी जागरण के लिए उपयोगी होते हैं।


ध्यान और मंत्र जप: ध्यान और मंत्र जप कुंडलिनी जागरण का एक अनिवार्य हिस्सा है। "ओम" जैसे बीज मंत्रों का उच्चारण कुंडलिनी ऊर्जा को जागृत करने में सहायक होता है।


चक्र ध्यान: ध्यान के माध्यम से व्यक्ति को अपने शरीर के सात चक्रों पर ध्यान केंद्रित करना होता है। इससे कुंडलिनी ऊर्जा को ऊपर उठने में मदद मिलती है।


संभावित चुनौतियाँ:

कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया बेहद शक्तिशाली होती है, इसलिए इसे एक प्रशिक्षित और अनुभवी योग गुरु के मार्गदर्शन में किया जाना चाहिए।

इस प्रक्रिया के दौरान कुछ मानसिक और शारीरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे ऊर्जा की अधिकता, भावनात्मक उथल-पुथल, या शारीरिक असुविधा।

कुंडलिनी जागरण का सही और संयमित अभ्यास व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक, और आध्यात्मिक रूप से एक उच्चतर स्तर पर पहुँचाता है, जिससे वह जीवन में संतुलन और शांति प्राप्त कर सकता है।

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डॉक्टर सुरेंद्र सिंह विरहे 

मनोदैहिक स्वास्थ्य आरोग्य विशेषज्ञ आध्यात्मिक योग चिकित्सक लाईफ कोच डिवाइन लाईफ सॉल्युशंस 

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Sunday, September 1, 2024

हमारे जीवन की सबसे बड़ी चुनौती !

हमारे जीवन की सबसे बड़ी चुनौती !

जिंदगी में समाधान डिवाइन लाईफ सॉल्युशंस द्वारा 

जिंदगी की चुनौतियों को स्वीकार करने और उनका सही समाधान करने की युक्तियां और मार्गदर्शन प्रस्तुत किया गया है । आइए जानते हैं अपने जीवन में विजयी होने के लिए कृत संकल्पित होकर अपने सपनों को साकार करें।


मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी चुनौती जिंदगी को सही मायने में समझना और उसे संतुलित रूप से जीना है। यह चुनौती कई स्तरों पर होती है, जिसमें बाहरी और आंतरिक संघर्ष दोनों शामिल होते हैं।


सबसे पहले स्वयं की पहचान और आत्मज्ञान होना अत्यंत महत्वपूर्ण है:


मनुष्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने आप को पहचानना है। यह समझना कि हम कौन हैं, हमारे उद्देश्य क्या हैं, और हमें किस दिशा में जाना चाहिए, एक जटिल प्रक्रिया है। आत्म-ज्ञान प्राप्त करना जीवनभर की यात्रा होती है और इस प्रक्रिया में व्यक्ति को कई बार आत्म-संशय, असुरक्षा, और भ्रम का सामना करना पड़ता है।

जीवन में हमेशा संतुलन बनाए रखना:

जीवन में संतुलन बनाए रखना एक और महत्वपूर्ण चुनौती है। यह संतुलन व्यक्तिगत जीवन, पेशेवर जीवन, सामाजिक संबंधों और आध्यात्मिकता के बीच होता है। अक्सर लोग किसी एक क्षेत्र में इतना उलझ जाते हैं कि दूसरे क्षेत्रों की उपेक्षा हो जाती है, जिससे जीवन में असंतुलन पैदा हो जाता है।


परिवर्तन के साथ तालमेल सहज स्वीकार भाव:

समय के साथ, दुनिया में, समाज में, और स्वयं के भीतर परिवर्तन होते रहते हैं। इन परिवर्तनों के साथ तालमेल बैठाना और उन्हें सकारात्मक रूप में स्वीकार करना एक बड़ी चुनौती है। कई बार लोग परिवर्तन का विरोध करते हैं, जिससे वे तनाव और निराशा का अनुभव करते हैं।


अप्रत्याशित और अनिश्चितता का सामना:


जीवन में बहुत सी चीजें अनिश्चित होती हैं, जैसे भविष्य में क्या होगा, यह कोई नहीं जानता। इस अनिश्चितता के बावजूद, जीवन को पूरी तरह जीने की कला में माहिर होना एक कठिन चुनौती है। यह विश्वास बनाए रखना कि चाहे जो भी हो, हम सही रास्ते पर हैं, बहुत ही कठिन हो सकता है।


जिंदगी के संघर्ष और दुःख को स्वीकारना:


जीवन में दुःख, संघर्ष, और पीड़ा का सामना हर किसी को करना पड़ता है। इन परिस्थितियों को स्वीकार करना और उनसे सीख लेकर आगे बढ़ना एक बड़ी चुनौती होती है। बहुत से लोग इनसे भागने का प्रयास करते हैं, लेकिन यह जीवन का हिस्सा है और इसे समझकर ही व्यक्ति आगे बढ़ सकता है।


आपसी संबंधों को बनाए रखना:


रिश्ते और संबंध जीवन का अहम हिस्सा होते हैं, लेकिन इन्हें सही रूप में बनाए रखना भी एक चुनौती है। हर व्यक्ति की अलग-अलग अपेक्षाएं, स्वभाव, और प्राथमिकताएं होती हैं। इन भिन्नताओं के बावजूद, एक-दूसरे के साथ समझदारी और सम्मान के साथ संबंध बनाए रखना जीवन की कठिन चुनौतियों में से एक है।


आत्म संतोष और कृतज्ञता:


मनुष्य की प्रवृत्ति हमेशा अधिक पाने की होती है। लेकिन जीवन में संतोष और कृतज्ञता का भाव बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। अधिक पाने की चाहत अक्सर व्यक्ति को असंतुष्ट और बेचैन कर देती है, जबकि कृतज्ञता से मन की शांति और संतोष की भावना विकसित होती है।


अटल शाश्वत मृत्यु का सामना:

अंततः, जीवन की सबसे बड़ी और अंतिम चुनौती मृत्यु का सामना करना होता है। यह सच है कि हर किसी को एक दिन इस संसार से विदा लेना है, लेकिन इस सच्चाई को स्वीकार करना और उसके अनुसार जीवन जीना एक गहन और चुनौतीपूर्ण कार्य है।

इन सब चुनौतियों का सामना करने के लिए मनुष्य को धैर्य, साहस, और सकारात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। जीवन की इन चुनौतियों को समझकर और उन्हें स्वीकार करके ही व्यक्ति एक पूर्ण और संतुलित जीवन जी सकता है।

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Saturday, August 31, 2024

जीवन के बुरे दिन में आत्म संघर्ष की शक्ति पाएं।

 शिवम योग दिव्य उत्कर्ष विद्या 

जीवन के बुरे दिन में आत्म संघर्ष की शक्ति पाएं।


यदि किसी व्यक्ति का बहुत बुरा वक्त चल रहा हो उसे मेहनत करने पर भी न सफलता मिल रही हो न सुकून आर्थिक तंगी हो भयानक रूप से तो इस बुरे वक्त से निकलने का उपाय क्या हो सकता है? आइए विस्तार से जानकारी समाधान जान लीजिए।


प्रिय साधकों!

कठिन समय का सामना करना एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण अनुभव हो सकता है। ऐसे में निराशा, हताशा और चिंता महसूस करना स्वाभाविक है। इस परिस्थिति से बाहर निकलने के लिए कुछ महत्वपूर्ण उपाय किए जा सकते हैं:


1.अपने जीवन में सतत धैर्य और संयम बनाए रखें:

बुरे वक्त में सबसे पहले और महत्वपूर्ण चीज़ है धैर्य और संयम। यह समय भी गुजर जाएगा। जब आप शांत मन से समस्याओं का सामना करेंगे, तो आप बेहतर तरीके से सोच पाएंगे और सही निर्णय ले पाएंगे।


2. अपने मनोबल को बढ़ाएँ:

सकारात्मक सोच बनाए रखें। अपने आप पर विश्वास करें और यह याद रखें कि जीवन में हर स्थिति अस्थायी होती है। सकारात्मक विचार और आत्मविश्वास आपको आगे बढ़ने में मदद करेंगे।


3. अपना आत्ममूल्यांकन करें:

खुद का आत्ममूल्यांकन करें और यह देखें कि कहां पर गलतियां हो रही हैं। अगर किसी कारण से सफलता नहीं मिल रही, तो अपने कार्यों और रणनीतियों को दोबारा जांचें और उनमें आवश्यक सुधार करें।


4.जिंदगी में नए कौशल सीखें:

कठिन समय में खुद को विकसित करने का प्रयास करें। नए कौशल सीखें, अपनी योग्यता को बढ़ाएं। इससे आपकी मूल्यवृद्धि होगी और रोजगार के नए अवसर मिल सकते हैं।


5. अपने आसपास समर्थन प्रणाली का उपयोग करें:

अपने परिवार, दोस्तों और करीबी लोगों से समर्थन लें। कभी-कभी समस्याओं को साझा करने से हल्कापन महसूस होता है और आपको नई दृष्टिकोण मिल सकती है।


6. ध्यान और योग करें:

मानसिक तनाव और चिंता को कम करने के लिए ध्यान और योग का अभ्यास करें। यह आपके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाएगा, जिससे आप समस्याओं का सामना करने के लिए अधिक सक्षम होंगे।


7. नई आर्थिक योजनाएं बनाएं:

आर्थिक संकट का सामना करने के लिए एक अच्छी वित्तीय योजना बनाएं। अपने खर्चों को नियंत्रित करें, बजट बनाएं, और जहां तक संभव हो, अनावश्यक खर्चों से बचें। किसी वित्तीय सलाहकार से परामर्श भी लिया जा सकता है।


8.परम सत्ता ईश्वर में आस्था रखें:

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, यदि आप किसी धर्म या ईश्वर में विश्वास रखते हैं, तो प्रार्थना करें और अपने मन को शांति देने का प्रयास करें। विश्वास से मन को शक्ति मिलती है और कठिनाइयों का सामना करना आसान हो जाता है।


9. अपने जीवन में सकारात्मक आदतें अपनाएं:

रोज़मर्रा की आदतों में सुधार लाएं। नियमित रूप से व्यायाम करें, स्वस्थ भोजन खाएं, और अपने शरीर और मन का ख्याल रखें।

 इससे आप अंदर से मजबूत महसूस करेंगे।


10.नए भावी विकल्पों का विश्लेषण करें:

जीवन में नए विकल्प तलाशें। हो सकता है कि आपकी मौजूदा स्थिति में सुधार के लिए कुछ अन्य रास्ते हों जिन्हें आपने अभी तक नहीं आजमाया हो। नए रोजगार, नई योजनाएं, या नए स्थान पर जाने की संभावना पर विचार करें।


11.कुशल बनकर समय का प्रबंधन करें:

समय का सही प्रबंधन करें। समय का सदुपयोग करने से आप ज्यादा प्रभावी ढंग से कार्य कर पाएंगे और यह भी देख पाएंगे कि कहां पर समय बर्बाद हो रहा है।


12. जीवन कोच विशेषज्ञ सलाह लें:

अगर आप किसी विशेष क्षेत्र में समस्याओं का सामना कर रहे हैं, तो उस क्षेत्र के विशेषज्ञों से सलाह लेना लाभदायक हो सकता है। जैसे कि करियर में समस्याएं हैं तो करियर काउंसलर से बात करें। जीवन कोच से परामर्श लें।


13. सतत सदैव आत्मचिंतन करें:

आत्मचिंतन का मतलब है अपने आप से सवाल पूछना कि इस समय में मैं क्या सीख सकता हूँ और कैसे इस परिस्थिति से बाहर निकल सकता हूँ। आत्मचिंतन आपको एक नई दिशा प्रदान कर सकता है।


14.दूरदर्शिता के साथ लंबी अवधि के लक्ष्यों पर ध्यान दें:

अपनी स्थिति को सुधारने के लिए दीर्घकालिक लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करें। छोटे-छोटे कदम उठाकर, बड़े लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। धैर्य और निरंतर प्रयासों से ही लक्ष्य प्राप्त होते हैं।

याद रखें, हर कठिनाई आपको एक नया सबक सिखाती है और आपको पहले से अधिक मजबूत बनाती है। बुरे वक्त से बाहर निकलने का रास्ता आपकी सोच, धैर्य, और निरंतर प्रयासों में ही छिपा है।

अंत में निष्कर्ष रूप में :

अपने अंदर की सुषुप्त दिव्य शक्ति को जाग्रत करें। अपनी योग्यता क्षमताओं को परिष्कृत करें। अपने गुण और अवगुणों को समझ कर विवेकशील बनें।

स्वयं को बेहतर ढंग से भविष्य के लिए तैयार करें। अपनी ऊर्जा  शक्ति का सही उपयोग करें । समय प्रबन्धन और आत्म अनुशासन को अपने जीवन में सर्वोच्च प्राथमिकता दें।


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Thursday, August 29, 2024

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Wednesday, August 28, 2024

व्यक्ति का दोहरा जीवन होता है - एक सार्वजनिक जीवन तथा दूसरा निजी जीवन!

व्यक्ति का दोहरा जीवन होता है - एक सार्वजनिक जीवन तथा दूसरा निजी जीवन!


जी हां मित्रों। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में दो अलग-अलग पहलू होते हैं—एक सार्वजनिक और एक निजी। इन दोनों जीवनों में अंतर होने के कारण कुछ लोग यह मान सकते हैं कि अधिकांश लोग मानसिक दृष्टि से "दोहरी मानसिकता" या "सीजोफ्रेनिक" होते हैं। हालाँकि, इसे वास्तविक सीजोफ्रेनिया से तुलना करना गलत है, क्योंकि यह मानसिक विकार अलग और विशिष्ट है।


1.जीवन में निजी और सार्वजनिक जीवन का द्वैत होता है:


हर व्यक्ति के जीवन में एक सार्वजनिक पक्ष होता है, जो कि समाज, कार्यस्थल, मित्रों और बाहरी दुनिया के लिए होता है। इस जीवन में व्यक्ति अक्सर सामाजिक मानदंडों और अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार करता है। दूसरी तरफ, निजी जीवन में वह अपने वास्तविक विचारों, भावनाओं और अनुभवों को व्यक्त करता है, जो अक्सर सार्वजनिक रूप से प्रकट नहीं किए जाते।


2. हर व्यक्ति से जुड़ी सामाजिक अपेक्षाएँ और व्यक्तिगत वास्तविकता:


सामाजिक जीवन में, व्यक्ति को कई भूमिकाएँ निभानी पड़ती हैं, जैसे कि एक माता-पिता, कर्मचारी, मित्र, या नागरिक। इन भूमिकाओं के साथ जुड़े दायित्व और सामाजिक अपेक्षाएँ अक्सर व्यक्ति को उसके वास्तविक विचारों और भावनाओं को छुपाने के लिए मजबूर करती हैं। दूसरी तरफ, निजी जीवन में व्यक्ति स्वतंत्र होता है और अपने वास्तविक व्यक्तित्व को जीता है।


3. मनोरोग के रूप में वास्तविक सीजोफ्रेनिया:


सीजोफ्रेनिया एक गंभीर मानसिक विकार है जिसमें व्यक्ति वास्तविकता और काल्पनिकता के बीच भेद करने में कठिनाई महसूस करता है। इसमें अक्सर भ्रम, मतिभ्रम, अव्यवस्थित सोच और असामान्य व्यवहार शामिल होते हैं। यह एक चिकित्सा स्थिति है, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं में गंभीरता से हस्तक्षेप कर सकती है।


4.व्यक्तित्व में दोहरापन द्वैत और मानसिक स्वास्थ्य:


यद्यपि अधिकांश लोग अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं में  दोहरापन द्वैत का अनुभव करते हैं, लेकिन यह मानसिक विकार का संकेत नहीं है। सार्वजनिक और निजी जीवन का अंतर मानव स्वभाव और सामाजिक संरचना का एक सामान्य हिस्सा है। यह केवल एक प्रकार का सामंजस्य है, जो व्यक्ति अपने जीवन में बनाए रखता है।


सामान्य जीवन की परिस्थितियों में अनुकूल प्रतिकूल प्रभाव पड़ता ही है।

हालाँकि, निजी और सार्वजनिक जीवन के बीच का द्वैत एक सामान्य मानव अनुभव है, इसे सीजोफ्रेनिया या मानसिक अस्थिरता से जोड़ना उचित नहीं है। वास्तविक सीजोफ्रेनिया एक चिकित्सा स्थिति है, जिसकी तुलना सामान्य जीवन की जटिलताओं से नहीं की जा सकती।


हर किसी का दोहरा जीवन होने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति मानसिक रूप से अस्थिर है; बल्कि यह मानव स्वभाव की जटिलता और सामाजिक संरचना का हिस्सा है।

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डा सुरेन्द्र सिंह विरहे 

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